Tuesday 4 July 2017

सलाम....सलाम...सलाम


शब्दों के साथ छपे चित्र मेँ दिखाई देने वाले  इस परिवार को जानता नहीं। पहचानता नहीं। समझता भी नहीं। बस, यूं ही सफर मेँ मिल गए। ट्रेन मेँ चढ़ने के कुछ मिनट के बाद महिला मेम्बर वीडियो कॉलिंग से घर के किसी मेम्बर को यह बताने और दिखाने लगी कि कौन, कहां और कैसे बैठा है। आश्चर्य हुआ, लेकिन मोबाइल के इस दौर मेँ सब संभव था, यह सोच, देखता रहा। यह महिला हर मेम्बर का ध्यान रख रही थी। दो बुजुर्गों को मम्मी, डैडी बोलने वाली महिला ने उनको बैठाने, बर्थ पर चढ़ाने, लिटाने के बाद  खाने को दिया, दवा दी और मुस्कुराते  हुए अपनी बर्थ पर लेट मोबाइल मेँ फेसबुक या व्हाट्सएप मेँ कमेंट्स पढ़ और मुस्कुराने लगी। उसने डैडी’, मम्मी को बताया भी कि किसने क्या लिखा।  मैंने मेरे पास बैठे बुजुर्ग से पूछा, आपकी बिटिया है क्या? ना, मेरी नू [बहू] है। बेटी जैसी बहू। उसके बाद तो कई घंटे के सफर मेँ इस बहू के व्यवहार, आचरण, परिवार के प्रति उनके संस्कार देख उनको मन ही मन सलाम किया। बहू की किसी बात मेँ कोई बनावट नहीं दिखी और ना महसूस हुई। परिवार के मेंबर्स मेँ इतना कोर्डिनेशन, स्नेह, आपसी समझ, अपनापन कि उसे शब्दों मेँ नहीं बताया जा सकता। इस परिवार का लड़के ने पहली बार ट्रेन मेँ सफर किया था। बुजुर्ग 40 साल बाद ट्रेन मेँ  बैठे थे। मैं, नीलम और बहिन शशि हरिद्वार पहुँच कर भी बहू की तारीफ करते रहे। परिवार के आपसी स्नेह की चर्चा कर उनसे प्रेरणा लेने की बात करते रहे। उनके 5 मेंबर्स से किसी यात्री को शायद ही कोई असुविधा हुई हो। और वापसी मेँ ऐसा परिवार मिला, जिसमें आपसी कोर्डिनेशन तो होगा, लेकिन उनको केवल अपनी सुविधा से मतलब था, दूसरों को असुविधा हो तो हो। ईश्वर करे पहले वाले परिवार को खूब खूब यश, वैभव, शांति, सुकून, आनंद, सुख मिले और वे हवाज़ जहाज के मालिक भी बनें तो ट्रेन मेँ यात्रा करें ताकि दूसरों को उनके व्यवहार से प्रेरणा लेने का मौका मिले। दूसरे परिवार को भी यह सब मिले, लेकिन वे ट्रेन मेँ किसी को भी ना मिले। पहले वाले परिवार को सलाम, सलाम सलाम, खास कर बहू को, जो एक उदाहरण है मेरी नजर मेँ। दूसरे  परिवार को नमस्कार बस। अभिनंदन उस कोख का जिसने ऐसी बेटी को जन्म दिया और धन भाग उस परिवार के जहां वो बेटी बहू बन के गई। 

Sunday 16 April 2017

विचार बदलते ही संस्कार बदल जाते हैं

श्रीगंगानगर। तीन पुली के पास स्थित श्रीधर्म संघ संस्कृत महाविद्यालय गौशाला का वार्षिक उत्सव आज समारोह पूर्वक हुआ। समारोह मेँ व्यास पीठ से भक्तमाल की कथा सुनाई गई। भजन और कीर्तन हुआ। वक्ताओं ने कहा कि रामायण के महत्व का बखान करते हुए कहा कि इसके बिना तो बैकुंठ भी अधुरा है। इसमें कहां कितनी गहराई है कोई नहीं जान सका। जो जितना गहरा उतरता है उतना ही अधिक पाता है। एक वक्ता ने वेद शास्त्रों और अर्थ की बात कही। उनका कहना था कि जिनके पास अर्थ है। अर्थ का अधिकार है, उनका गौरव और सम्मान वेद की रक्षा के लिए अपना समर्पण करें। वेद शास्त्रों के कारण ही तो धर्म जीवित और ज्वलंत हैं। भारत है। हिन्दू हैं। मुख्य वक्ता ने कहा कि जिस दिन 16 संस्कार समाप्त हो जाएंगे उस दिन हिन्दू नहीं रहेगा। सनातन धर्म नहीं रहेगा। उन्होने यह बार धर्म परिवर्तन, वर्ण परिवर्तन के संदर्भ मेँ काही। वे बोले, धर्म और वर्ण परिवर्तन से कुछ नहीं होने वाला, सदियों से हो रहा है। संस्कार सनातन धर्म का आधार हैं। जब तक ये हैं तब तक सनातन धर्म और हिन्दू समाप्त नहीं हो सकते। एक वक्ता ने कहा कि विचार बदलते ही संस्कार और संसार बदल जाते हैं। कुम्हार जिस मिट्टी से चिलम बनाता है अगर उसी मिट्टी से चिलम के स्थान पर घड़ा बनाए तो मिट्टी का संसार बदल जाता है। उसके संस्कार बदल जाते हैं। कई घंटे के इस आयोजन मेँ स्वामी ब्रह्मदेव जी, संगरिया के दयानन्द शास्त्री, तनसुख राम शर्मा, विधायक कामिनी जिंदल, राजकुमार गौड़ सहित शहर के अनेक नागरिक मौजूद थे। संस्था के संचालक स्वामी कल्याण स्वरूप सहित विभिन्न स्थानों से आए अनेक संत मौजूद थे। ओजस्वी ढंग से मंच संचालन स्वामी स्वदेशाचार्य ने किया। कुछ मिनट के लिए पूर्व मंत्री देवी सिंह भाटी भी कार्यक्रम मेँ पहुंचे। 

Tuesday 14 March 2017

लोकतन्त्र मेँ सत्ता का अपहरण

गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। लगभग साढ़े चार दशक पुरानी गोपी फिल्म के एक गीत की पंक्ति है, जिसके हाथ मेँ होगी लाठी भैंस वही ले जाएगा। देख लो, गोवा और मणिपुर मेँ बीजेपी वाले ले गए। क्योंकि वर्तमान मेँ लाठी इनके हाथ मेँ है। लोकतन्त्र का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है। जहां के वोटरों ने बीजेपी को बहुमत नहीं दिया। बहुमत क्या, सबसे बड़े दल के रूप मेँ भी पसंद नहीं किया, वहां बीजेपी सरकार बना रही है। इसे कहते हैं सत्ता का अपहरण। जब सबसे बड़ा दल कांग्रेस है तो फिर उसे ही सरकार बनाने के लिए बुलाया जाना चाहिए। मगर नहीं। शर्म और बेहद शर्म की बात है ये, सभी के लिए। लोकतन्त्र के वास्ते भी और देश की राजनीति के वास्ते भी। अगर ऐसा ही कुछ यूपी मेँ होता तब! बीजेपी यूपी मेँ सबसे बड़े दल के रूप मेँ सामने आती तो बीजेपी को ही बुलाया जाता! उसी का हक बनता। मगर उत्तर से पूर्व की ओर जाते जाते लोकतन्त्र के मायने ही बदल गए। लाठी को हाथ मेँ ले सत्ता इस प्रकार हथियाई जाएगी, किसने सोचा होगा। राजनीति से नीति को निकाल फेंक दिया गया। राज को हासिल करने के लिए नैतिकता, मर्यादा सब को हवा मेँ उड़ा दिया गया। पूछे कौन? सवाल करने की हिम्मत किसकी है? सब देख रहे हैं। कोई कुछ बोलेगा तो भी कुछ नहीं होने वाला। ये तो कुछ भी नहीं एक छोटे से राज्य मेँ अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए विधायकों की इस मांग को भी मान लिया गया कि रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को सीएम बनाया जाए। जिस नेता ने बढ़िया मंत्री के रूप मेँ देश भर मेँ पहचान बनाई। इज्जत कमाई। जिसने देश की सेना का मनोबल बढ़ाया। जिस मंत्री ने सेना मेँ नई ऊर्जा का संचार किया, उसे छोटे से राज्य मेँ भेज दिया गया। बात ये नहीं कि पर्रिकर जैसा रक्षा मंत्री बीजेपी के पास नहीं होगा। खूब होंगे। किन्तु कोई ये तो बताए कि राजनीति मेँ उज्ज्वल छवि के मनोहर पर्रिकर को क्यों एक छोटे से स्थान पर सीमित किया जा रहा है। इस बात से एक बड़ा प्रश्न भी लोकतन्त्र के सामने ही नहीं बीजेपी के सामने भी आ खड़ा हुआ है। आज तो गोवा विधायकों की डिमांड पर मनोहर पर्रिकर को केंद्र से हटा वहां भेजा गया है। कल को यह स्थिति गुजरात मेँ सामने आई तब क्या होगा! विधायकों ने ये डिमांड कर ली कि वे तो केवल नरेंद्र मोदी के साथ ही आएंगे। तब क्या बीजेपी नरेंद्र मोदी को पीएम पद से हटा गुजरात की कमान सौंप देगी? क्या ये संभव है? सवाल ही पैदा नहीं होता। कल्पना भी नहीं हो सकती। बीजेपी को कांग्रेस मुक्त भारत की अपनी सोच को आगे बढ़ाने की इतनी जल्दी है कि उसने गोवा और मणिपुर मेँ सत्ता का अपहरण करने से भी परहेज नहीं किया। यूपी जैसे बड़े राज्य की सत्ता भी उसे संतुष्ट नहीं कर पाई और सत्ता की अपनी भूख शांत करने के लिए वहां भी सत्ता पर कब्जा कर लिया जहां, पहला हक बड़े दल का था। बेशक, बीजेपी वाले खुशी मनावें। शानदार विजय के गीत गावें। परंतु लोकतन्त्र मेँ यह ठीक नहीं है। आज बीजेपी ने अपनी सत्ता के दम पर ये किया है, कल को दूसरे दल भी सत्ता के नशे मेँ ऐसा कर सकते हैं। बीजेपी की शान तो तब बढ़ती जब वह गोवा और मणिपुर दोनों मेँ चुनाव मेँ सबसे अधिक सीट लेने वाले दल को पहले सरकार बनाने का मौका देती। वो इनकार करती या असमर्थता जताती तब वह सामने आती और सरकार बनाने का दावा पेश करती। परंतु ऐसा करने की जरूरत ही महसूस नहीं की गई। झट से सत्ता का अपहरण करने की योजना बनी और सबकी आँखों के सामने यह सब हो गया। कोई कुछ नहीं कर सकता। किसी की हिम्मत नहीं। आज का लोकतन्त्र यही है। चार  लाइन पढ़ो-
वतन से इश्क की बात करते हो 
सड़े, गले पुराने दौर के लगते हो,
अपने मतलब की बात करो जनाब 
दिलों मेँ क्यों फिजूल की बात भरते हो। 


Friday 13 January 2017

naya yug

इक युग ऐसा भी आएगा 
राम को वन मेँ मारा जाएगा,
विभीषण होगा रावण का जासूस 
भरत रावण से हाथ मिलाएगा। 
कोई सीता श्रीराम के लिए 
कभी ना खुद को रुलाएगी,
रावण का हाथ पकड़
लंका की पटरानी बन जाएगी............[ जारी है]
[2g]

Tuesday 26 April 2016

इबादत तेरी करने लगा और 
इश्क खुदा से, 
तेरे ख्याल ने यारा सब 
गड्ड मड्ड कर दिया। 
[2g]

....
सस्ते मेँ ही बेच दिया मुझको 
कुछ तो मोल लगाते जनाब। 
रिश्ते झूठे, पैसे सच्चे 
सच एक है, यही जनाब।
बिछड़ गए सब संगी साथी 
अब तो है, बस याद जनाब।
झूठी हकीकत, सच्चे ख्वाब
मेरी पूंजी, इतनी जनाब।
[2g]

Monday 22 February 2016

दुविधा

3- 
दादा पिता लाहौर मेँ सब कुछ छोड़ के आए थे। इसलिये इधर था ही नहीं अधिक कुछ। दो पैसों के लिए कभी 5-10 पैसे वाले पुड़ी के पत्ते लगाता। कभी कुछ करता। एक दो बुरी बात भी थी। नगर पालिका पार्क की लाइब्रेरी के स्टोर से दरवाजे के नीचे से झाड़ू की सींक से अखबार निकाल लेते थे। करना क्या था....पार्क मेँ ही खेलते। पिता जी कारखाने मेँ काम करते थे। सर्दियों मेँ मैं अक्सर रात को वहीं सोता। एक मिस्त्री था, उन्होने रुमाल का चूहा बनाना और उसे हाथ पर चलाना सिखाया। वह आज भी बड़े शानदार ढंग से बनाना और चलाना आता है। बच्चों को बना और चला के दिखाता हूँ। स्कूल मेँ किसी मास्टर की मार तो नहीं खाई लेकिन घर मेँ माँ की जरूर खाई। माँ कहती थी, मैं कभी कभी कुछ ना कुछ गुनगुनाता रहता था। ऐसे ही कोई शब्द। बात। कुछ लाइन। मेरे दादा श्री मंगल चंद जी तीन भाई थे। श्री मांगी लाल जी और निहाल चंद जी उनके भाई थे। तीनों के मकान साथ साथ थे। पार्क के सामने। हर शाम तीनों परिवारों के पुरुष, बच्चे मांगीलाल दादा जी के जरूरु जाते। चबूतरे पर बड़ा लकड़ी का पट्टा था। वहाँ बैठते। बात चीत होती। सर्दी मेँ यह बैठक घर के बाहर वाले कमरे मेँ लगती। गजसिंहपुर मेँ दो भाई बहिन की शादी हो गई। बड़े भाई नेमी चंद गंगानगर आ गए। काम के लिये। फिर ये तय हो गया कि परिवार का गजसिंहपुर को अलविदा करने का समय आ गया...रोटी, रोजी के लिये गंगानगर जाना होगा.....

4--तो ये तय हो चुका था कि गजसिंहपुर को छोड़ना ही होगा। जहां पेट रोटी को तरस जाए, उधर कौन रहना चाहेगा। लाइन पार का पनघट। उसके पास छोटा खाला। आगे जाकर खेत मेँ बना शिवालय। गन्ने से लदी माल गाड़ी से गन्ने खींचना। मंडी से छोड़ने से पहले मोती नामक कुत्ता हमें छोड़ गया। घर के सामने वाले ने उसे दिन दिहाड़े गोली मार दी। क्योंकि एक दिन मोती ने उस पर भोंकने की गलती कर दी थी। मोती बेशक हमारा पालतू नहीं था, लेकिन उसे चौखट हमारी ही प्यारी थी। रिश्तेदार आना है, उसे ट्रेन से लेकर आना। जाना है, तो स्टेशन तक छोड़ के आना। जो दिया, वही खाया। हम स्टेशन पर आ चुके थे। बस, मोती नहीं था हमें अलविदा कहने के लिये। ट्रेन लेट थी। मैं खुश था, ट्रेन मेँ चढ़ना था। गंगानगर आना था। माँ, पिता, भाई, बहिन के चेहरे पढ़ ही नहीं पाया। आता ही नहीं था पढ़ना। परंतु आज सोचता हूँ तो वे चेहरे यकीनन उदास ही रहे होंगे। उन पर अपने भरे पूरे परिवार को, गलियों, घर को छोड़ने का रंज तो रहा ही होगा। हरियाणा के बरोदा बिटाना से बुढ़लाडा, वहाँ से लाहौर फिर गजसिंहपुर.....कैसे कैसे दिन ये दिखाई जिंदड़ी। ट्रेन का आना मेरे लिये उल्लास, खुशी और आनंद का विषय था और शायद माँ के लिये विषाद का विषय रहा होगा। हे भगवान, माँ के प्रस्थान कर जाने के बाद ही यह सब लिखने का विचार क्यों आया.....

Saturday 20 February 2016

दुविधा

2—
शिशु की दिनचर्या जैसी होती है मेरी भी थी। रोना, सोना और दूध पीना। सरका , घुटनों के बल चला। और फिर पैरों पर। आँगन बड़ा था। दहलीज़ ऊंची थी। बाहर जा नहीं सकते थे। पाँच साल का हुआ। सरकारी स्कूल मेँ भर्ती हो गया। फेल होने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। एक कायदा, एक स्लेट और एक तख्ती, यही होता था, कपड़े के थैले मेँ। जो आजकल स्कूल बैग के नाम से जाना जाता है। स्कूल जाने से पहले और आने के बाद खेलना। वह कंचे, सिगरेट की डब्बी, गेंद, शाम को कबड्डी। पतंग उड़ाना। दूसरी, तीसरी मेँ हो गए। दादी जी प्रस्थान कर गईं। स्मृति इसलिये है कि मरने पर जो आज होता है, तब भी वैसा ही हुआ था। मैं नहीं गया था, श्मशान मेँ। गली मेँ खेल रहा था। दादा की दुकान थी। पिता कारखाने मेँ काम करते थे। एक दिन मैंने और चचेरे भाई ने दुकान से दस दस पैसे चुरालिए थे। जो होना था हुआ। पहले लाइन से उस पार स्कूल मेँ था। फिर घर के पास स्थित स्कूल मेँ लगा दिया गया। पड़ोस मेँ एक लड़के की शादी हुई। लड़का परदेश रहता था। उसकी बहू बिलकुल अनपढ़। उन्होने मुझे लिखना सिखा दिया। परदेश से जो पत्र उसके पिया जी उसे भेजते। वह मुझसे पढ़वातीं। चूंकि गली मेँ हम ही ज्ञानवान, गुणवान और राज को राज ही रखने मेँ निपुण थे, इसलिये मुझे वह पत्र पढ़ कर सुनाना होता और उसका जवाब भी लिखना होता। इसके बदले मुझे मिलते दस पैसे, कभी कभी पच्चीस पैसे। कभी पैसे की जरूरत होती तो मैं पूछ लेता, चिट्ठी आई क्या? वह सिर हिला देती। कई बार झिड़क कर कहती...नई आई रे। क्यों जान खा रहा है। काम करने दे.....दोनों उदास। वो अपने कारण और मैं अपनी दस्सी की वजह से। ये तो अब मालूम हुआ कि चिट्ठी आई होती तो मुझे तो पता लग ही जाता.....

Friday 19 February 2016

दुविधा...

कमेंट्स करने से पहले पढ़ लेना प्लीज....
55
साल के इस गोविंद के कई रूप हैं। 55 साल का बेटा, भाई है तो लगभग 25 साल का पिता भी। पति, चाचा, मामा, दादा, ससुर, दोस्त,......जैसे कितने व्यक्ति एक के अंदर गईं....साथ मेँ पत्रकार भी है...आम इंसान भी ...जिज्ञासु.......किस गोविंद का जिक्र करूँ....समझ से परे......गोविंद के प्रेम का जिक्र नहीं होता तो गोविंद की कथा अधूरी है। उलझन है, दुविधा है, लेकिन कहानी है तो शुरू करनी ही होगी। अंत कैसा होगा क्या पता? वो तो क्लाइमेक्स लिखने के बाद ही मालूम होगा। प्रेम! प्रेम तो साथ चलेगा ही।

1-55 साल पहले 16 जनवरी के दिन माँ को सुबह ही अहसास होने लगा था कि मैं आने वाला हूँ। शाम होते होते यह अहसास प्रसव पीड़ा मेँ बदल गया। दादी ने धाओ दाई को बुला लिया। गजसिंहपुर मेँ पालिका पार्क के बिलकुल निकट घर के बीच वाले कमरे मेँ शाम को 7.34 बजे मैं गर्भ गृह से बाहर आया। मैंने इस अलौकिक, दिव्य और अद्भुद सृष्टि को नजर भर देखने की शुरूआत करने की बजाए रोना शुरू कर दिया। माँ से अलग करने के लिए धाओ ने नाल काट दी। माँ प्रसव की तीव्र पीड़ा के बावजूद खुश खुश रही होगी और मैं लड़का होने के बावजूद रो रहा था। शायद पीड़ा माँ को रही थी और रो मैं रहा था। धाओ ने मुझे पोंछ कर माँ के निकट लिटा दिया। माँ देखती रही। कुछ देर बाद कानों मेँ थाली बजने की आवाज सुनाई दी। माँ बताया करती थी, तू जब पैदा हुआ तब तेरे कान छिदे हुए थे। कानों मेँ छेद थे। शायद पिछले किसी जन्म मेँ तू कोई साधू, संत था...............

Saturday 2 January 2016

बीजेपी श्रीमान अजय चान्डक का करेगी क्या



श्रीगंगानगर। हर रोज वही बात अजय चान्डक बीजेपी मेँ जा रहे हैं। नहीं जा रहे। उनको भाव नहीं मिला। उनको नहीं लिया। लेंगे या नहीं इस पर असमंजस है। तमाम बातें आधारहीन हैं। ऐसा लगता है किसी ने अजय चान्डक से बीजेपी मेँ शामिल करवाने का ठेका ले लिया है। माननीय मंत्री टीटी जी का ये कहना कि गंगानगर मेँ बीजेपी के पास कोई लीडर नहीं, उसी ठेके का हिस्सा लगता है। सोचने वाली बात ये कि बीजेपी श्रीमान अजय चान्डक का करेगी क्या? उसके पास ना तो विधायकों की कमी है और ना ऐसे नेताओं की। फिर अजय चान्डक तो सभापति होने के बावजूद कुछ जानते ही नहीं। उनको ना तो सभापति के पद की गरिमा और अधिकारों का ज्ञान है और ना नगर परिषद के काम काज का। फिर अजय चान्डक मेँ ऐसी कौनसी काबिलियत है कि वे बीजेपी के उस खाली स्थान को भर देंगे, जिसका जिक्र टीटी ने बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के सामने किया है। इसके बावजूद किसी को अजय चान्डक जी को बीजेपी मेँ शामिल करवाने का जुनून सवार है तो है। उनके आने से बीजेपी को तो कोई राजनीतिक लाभ मिलने वाला नहीं, किसी को व्यक्तिगत फायदा हो तो हो। 

Wednesday 30 December 2015

जाने वाले लौट के जरूर आना, मेरे लिये!


श्रीगंगानगर। कैलेंडर 2015, आखिर तेरे जाने का समय आ ही गया। कितने धूमधाम से आया था तू। कैसा स्वागत हुआ था। और आज तुझे चले जाना है। कभी लौट के ना आने के लिये। प्राणी भी चले जाते हैं यहाँ से । तुम तो फिर  भी कैलेंडर हो। प्राणी कब जाएगा, कोई नहीं जानता, तुम्हारा सबको पता होता है कि कब जाना है। तुम्हारे पास 365 दिन थे। उनमें वे सब भाव थे, जो इंसान कि जिंदगी मेँ होते हैं। अच्छे-बुरे, दुख के, सुख के, गम के, खुशी के, आनंद के, रोने के, हंसी के, शौक के, मस्ती के। हर रंग थे हर  दिन मेँ । किसके को क्या मिला, यह मुकद्दर की बात है, तुम सभी के लिये सब कुछ लेकर आए। सुहानी सुबह। उजला प्रभात। रंग बिरंगी सुबह और शाम की लालिमा। कभी रिमझिम तो कभी तेज बरसात। ठंड के समय ठंड। गर्मी के दिनों मेँ गर्मी। सब कुछ तय था। समय के अनुसार। सब मौसम थे, एक प्यार के मौसम  को छोड़। उसे तुमने तारीखों मेँ नहीं बांधा। क्योंकि तुम जानते हो कि यह तो हर पल करने और महसूस करने वाले भाव हैं, जो ज़िंदगी के लिये सबसे जरूरी है। दुनिया को क्या क्या दिया, मुझे क्या मालूम। परंतु मुझे तुमने खूब दिया। अच्छे सच्चे दिन। खूब सारी खुशी। पुराने सम्बन्धों की मजबूती। नए सम्बन्धों की गरमाहट। नए रिश्तों की आहट । अपनों की चाहत। ढेर सारा सम्मान। जब मौका मिला, तेरी सुबह शाम को निहारा। दूज का चांद को प्रणाम किया। पुर्णिमा के चांद को देखा तो देखता ही रहा। सुबह उगते सूरज की तरफ नजर गई तो सृष्टि के रचियता को मन स्वतः ही प्रणाम करने लगा। सुनो 2015, तुम्हारी तारीखों मेँ मेरी मीठी मीठी याद बंधी है। कई तारीख मेरे रिश्तों से महक रही होंगी । कुछ मेँ निर्मल, सात्विक, पवित्र प्रेम की चहक कानों मेँ पड़ेगी। उसे सुनना जरूर। तुझे गर्व होगा उस तारीख पर। कई तारीख बच्चों के गौरव से जुड़ी है। कोई तो बहुत बड़े आनंद से गूँथी है। किसी मेँ हल्की फुल्की  तकरार भी है, प्यार वाली। उसे भी संभाल कर रखना। मुझे याद रहेंगी ये सब तारीख। क्योंकि ये हैं ही इतनी लाजवाब कि इनको भूल ही नहीं सकता। इनको भुलाने का मतलब है, खुद को भूल जाना। मुझ अदने से को तूने  इतना दिया है कि यह याद भी नहीं कि क्या क्या मेरी झोली मेँ डाला। मेरी झोली भरी हुई है।  नए 365 दिन काम करने के लिये। 365 रात विश्राम के लिये, ताकि काम के लिये और ऊर्जा मिल सके। इंसान हूँ ना । बहुत तारीखें खराब की होंगी मैंने। उसका परिणाम मुझे भुगतना है। लेकिन ये सच है कि तूने 365 दिनों मेँ मुझे देने मेँ कोई कमी नहीं रखी। बे हिसाब दिया। कल्पना से अधिक दिया। तेरा बार बार शुक्रिया कर तेरे दिये को छोटा नहीं करना चाहता। अब इतना सब अच्छा और आनंद दायक मिला तो कुछ चटपटा भी होना चाहिए। तेरे इस पीरियड मेँ गम, शौक, दुख, दर्द, आह! जो भी मिला वो मेरा प्रारब्ध था। उसमें तेरा कोई कसूर नहीं था 2015। तुम अपने दिल मेँ इस संबंध मेँ कुछ भी महसूस मत करना। तूने इतना कुछ दिया कि बार बार शुक्रिया करूँ तो भी कम है। तेरा हाथ पकड़ उसे प्यार से चूम आभार जताऊँ तो भी काफी नहीं। तेरे दिये के बदले दंडवत करूँ, कदमों मेँ सजदा करूँ, तो गुस्ताखी होगी। जितना तूने दिया उतना काबिल नहीं था मैं।  परंतु तेरी मेहर की बरसात का क्या! होती गई, होती गई। मैं सराबोर होता रहा, तेरी रहमत से। तेरी मेहरबानियों से, तेरे प्यार से।  सच मुच तूने मुझे लाजवाब कर दिया। मालामाल कर दिया। जो नहीं था, वह सब मिला। बस एक ही शिकवा है तुझसे कि तू जाते जाते मेरा अतीत, वर्तमान और भविष्य अपने साथ ही ले चला। ये सब ले जाने की वजह तू ही जाने। हम क्या जाने तेरे मन मेँ क्या है।  संभव है  2016 से इस बाबत तेरी कोई बात हुई हो। फिर भी इतनी ख़्वाहिश बार बार है कि 2015 तू बार-बार, हर बार मेरे घर आए, मेरे आतिथ्य स्वीकार कर मुझे धन्य करे। ताकि मैं तारीखों के संग समय बिता खुश हो सकूँ, उन तारीखों के संग, जिनसे मेरी मधुर स्मृतियाँ जुड़ी हैं । दो लाइन पढ़ो—

कौन कमबख्त रोना चाहता है यहां 
इक दर्द ऐसा भी है, जो हंसने नहीं देता। 

Thursday 24 December 2015

AMOGH DIVISION REACHES OUT TO YOUTH OF GANGANAGAR


  SHRIGANGANAGARTeam of Army Officers from Amogh Division delivered motivational lectures in various Colleges & University including Khalsa College, Sihag Nursing College, Government College, Karanpur & Tantia University from 21st to 23rd December on the eve of commemoration of battle of Nagi fought between India and Pakistan in 1971 in Sriganganagar sector.  Students as well as professors had gathered in the college auditoriums to attend the motivational lecture, as Major Shashank Deep & Lieutenant Madhav Kumar eloquently spoke about the heroics of the soldiers of the Indian Army.  The event also acted as motivation to youth of Sriganganagar to achieve desired result of projecting Army as a viable career with the theme ‘Indian Army & Nation Building - Be a winner for India’.Each session was well spent for the students who turned up for the event.  The good turnout at each event made it amply clear that the audience were looking forward to these motivational talks. Young eager minds were not disappointed and were made aware of the sacrifices the Indian soldiers made selflessly for their motherland in the battle of Nagi.The youths were introduced to the army way of life and its strong ethos and traditions, which propels a soldier to make supreme sacrifice.  Battle of Nagi left an everlasting impression on the minds of students and would undoubtedly compel them to realise that battle is the most significant competition in which a man indulges and these heroes should be revered forever.this information have been givan to us by Lt Col Manish Ojha Defence Spokesperson,Rajasthan

Sunday 20 December 2015

सुरम्या अखबार का विमोचन


श्रीगंगानगर। स्वामी ब्रह्मदेव कहते हैं कि शब्दों का प्रयोग बड़ी सूझ से करना चाहिए। इनका प्रयोग करने से पहले ये देख लेना चाहिए कि लिखे और बोले गए शब्द आग लगाने वाले ना हों। स्वामी जी आज सुबह कंगन पैलेस मेँ “ सुरम्या “ अखबार के विमोचन समारोह मेँ मुख्य वक्ता के रूप मेँ बोल रहे थे। उन्होने कहा, शब्दों के कई रूप होते हैं। वे उत्तेजित मन को शांत करने की ताकत रखते हैं तो शांत मन को अशांत भी कर सकते हैं। शब्दों के संसार मेँ विचरण करते हुए स्वामी जी ने कहा कि बुरी सोच और पैर की मोच इंसान को आगे नहीं बढ़ने देती। उन्होने रूहानियत को आत्मा की खुराक बताया। सुरम्या की व्याख्या की। उसकी थीम की सराहना की। प्रकाशित सामग्री को बहुत ही सारगर्भित बताया। श्रीगंगानगर क्षेत्र और उनके निवासियों की प्रशंसा करते हुए स्वामी जी ने कहा कि इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया है। अब तो यह जीवन इसी को अर्पित कर दिया है। झांकी वाले बाला जी के प्रेम अग्रवाल “ गुरु जी “ ने अपने सम्बोधन मेँ सुरम्या की सोच की सराहना की। भटिंडा से आए अंक ज्योतिषी हरविंदर गोयल ने शुभकामना देते हुए सहयोग का वादा किया। पूर्व मंत्री राधेश्याम गंगानगर ने बधाई  देते हुए मीडिया की वर्तमान स्थिति पर पीड़ा व्यक्त की। आरएसएस के कैलाश भसीन ने मीडिया के कारोबारी हो जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए सुरम्या से कारोबार से बचाने की सलाह दी। यूआईटी के पूर्व अध्यक्ष राज कुमार गौड़ ने अखबार को कठिन रास्ता बतलाते हुए मंगल कामना  दी। मंच पर स्वामी ब्रह्मदेव जी के साथ हरविंदर गोयल, प्रेम अग्रवाल और नेमी चंद गोयल मौजूद थे। मेहमानों का गोयल परिवार की ओर से नेमी चंद गोयल, इन्द्र कुमार गोयल, भगवान दास गर्ग, आशु अग्रवाल, सुमित गर्ग, एडवोकेट संजय गोयल, मोहित नारायण गोयल और शिव जालान ने फूल माल पहना स्वागत किया। संचालन  अखबार की संपादक स्वाति गोयल ने किया। सलाहकार गोविंद गोयल ने अखबार की थीम बताई। प्रभारी संपादक उपेंद्र महर्षि ने धन्यवाद दिया। समारोह मेँ बड़ी संख्या मेँ नगर के विभिन्न  क्षेत्रों से जुड़े व्यक्ति मौजूद थे। प्राचीन शिवालय के महंत कैलाश नाथ जी ने सुबह घर पहुँच आशीर्वाद दे अखबार की थीम पर चर्चा की। सुरम्या परिवार के अनुसार स्वास्थ्य, धर्म और अध्यात्म का सुरम्या फिलहाल पाक्षिक के रूप मेँ प्रकाशित होगा। पूजा और नमाज- रविवार को सुबह गोविंद गोयल के निवास पर पंडित जनार्दन शर्मा ने सुरम्या अखबार की पूजा करवाई। दोपहर बाद वहीं रोड़ावाली गाँव के मौलवी इमदाद भाई ने नमाज अता की। वे शुभकामना देने आए थे कि नमाज का समय हो गया। फिर उन्होने वहीं नमाज पढ़ी।   

Friday 11 December 2015

विधायक कामिनी ने शहर के हालात पर शर्मिंदगी जताई, स्वाति ने हालात पीएम को बताई


श्रीगंगानगर। यह संयोग है या कुछ और कि  जिस समय भारी मतों के अंतर से विधायक चुनीं गईं कामिनी जिंदल अपने दो साल की उपलब्धि बताने के बावजूद शहर के हालात पर शर्मिंदगी महसूस कर रहीं थीं, उसी समय पत्रकार गोविंद गोयल की बिटिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख शहर के हालात बता रही थी। हालांकि दोनों मेँ किसी प्रकार की तुलना नहीं की जा सकती। एक तो इसलिए क्योंकि हर इंसान की अपनी पहचान है, दूसरा कहाँ तो एक विधायक और कहाँ एक नागरिक। इससे भी आगे कामिनी जिंदल के पिता जाने माने पूंजीपति और स्वाति के पिता के साधारण इंसान। मगर इतना कहना गलत नहीं होगा कि ये सोच का विषय है। कामिनी ने  विधायक होने के बावजूद ऐसा कुछ नहीं किया जिससे पब्लिक को ये अहसास हो कि विधायक उनके साथ है, जबकि स्वाति के पीएम को केवल पत्र लिखने मात्र से पब्लिक ये कह रही है कि चलो कोई तो है जिसने शर्मिंदगी जताने की बजाए पीएम को पीड़ा बताई। सवाल ये नहीं कि काम होता है या नहीं, बात ये कि किसने समस्या के समाधान के लिए क्या प्रयास किए। दोनों ने अपनी अपनी बात 8 दिसंबर को कही। कामिनी जिंदल को विधायक और बी डी अग्रवाल की बेटी  होने के कारण मीडिया मेँ तवज्जो मिलनी ही थी, स्वाति को भी उसके कद के अनुरूप तवज्जो दी मीडिया ने। फेसबुक पर भी दोनों की खबरों को लोग डाल रहे हैं। एक दूसरे को टैग कर रहे हैं। लोग अपने अपने विचार लिख स्वाति का हौयला बढ़ा रहे हैं। कामिनी जिंदल के समर्थक उसके पक्ष मेँ लिख रहे हैं। किन्तु इसमें कोई शक नहीं कि स्वाति गोयल ने एक साधारण नागरिक होने के बावजूद शहर की पीड़ा को पीएम तक पहुंचाया है।