Saturday, 28 February, 2009

जनता का विधायक कुन्नर अब मंत्री बना

विधायक गुरमीत सिंह कुन्नर को आज राजस्थान सरकार में राज्य मंत्री के रूप में शामिल कर लिया गया। श्री कुन्नर को जनता ने चुनाव लड़वाया और विजय बनाकर विधानसभा में भेजा। आज जयपुर में हुए मंत्री मंडल के विस्तार में श्री कुन्नर को स्थान मिल गया। उनके मंत्री बनने के चांस उसी समय लगने लगे थे जब उन्होंने श्री अशोक गहलोत को अपना समर्थन दे दिया था। श्रीगंगानगर-हनुमानगढ़ जिले में ११ विधायक हैं। मंत्री बनने का सौभाग्य केवल श्री कुन्नर को ही मिला है।

किसी ने कहा अपशगुन किसी ने वरदान

ये क्या है?भ्रम,चमत्कार, या अन्धविश्वास। इस पोस्ट में हमने एक विडियो दिखाया था। शनि देव की जोत की लौ में कुछ अलग किस्म का नजारा दिखाई दे रहा था। कई बुद्धिजीवियों ने अपनी टिप्पणी इस पर दी। मगर जिन के घर ऐसा हुआ उनको तस्सली नही हुई। उन्होंने जगती जोत का विडियो कई अन्य जनों को दिखाया। एक आचार्य ने बताया कि यह तो शनि देव का प्रकोप है। हो सकता है आपने उसकी पूजा अर्चना में कोई कसर छोड़ दी हो। उसने इस प्रक्पो से निपटने के उपाय भी बताये। एक ज्योतिषी ने ने आचार्य की हाँ में हाँ मिली। उसने बताया कि वैसे जो शनिदेव न्याय के देवता है। हो सकता है आपके परिवार ने उनके सम्मान में कोई गुस्ताखी की हो। इस लिए थोड़ा बहुत तो संकट आ ही सकता है। उसने भी संकट से उबरने के उपाए बता दिए। एक ज्योतिषी आचार्य ने बार बार विडियो को देखा। उस स्थान को देखा जहाँ जोत जलाई गई। जोत को नमन किया। ठंडी साँस लेकर कहने लगे--भाई आपके तो भाग खुल गए। शनि महाराज ने जोत पर अपने आशीर्वाद का हाथ रख दिया है। एक महाराज जी ने जोत पर जो दिखाई दे रहा है उसको शेष नाग के फन का प्रतीक बताया। हर शनिवार शनि मन्दिर में जाने वालों को बताया गया तो वे विडियो की प्रति लेने को आतुर हो गए। कहने लगे--हमारे यहाँ तो कभी ऐसा दृश्य दिखाई नही दिया।परिवार को बहुत ही भाग्यशाली बताते हुए उहोने इस बात का धन्यवाद दिया जो उनको यह जोत देखने को मिली। इस प्रकार के किसी आदमी ने इस बात को भ्रम या सामान्य बात बात मानी। सब ने इसको शनि के आशीष और शनि के प्रकोप से जोड़ा।

Wednesday, 25 February, 2009

लैला-मंजनू की आखिरी पनाहगाह


लैला-मंजनू का नाम कौन नहीं जानता! ये नाम तो अमर प्रेम का प्रतीक बन गया है। लैला-मंजनू के आत्मिक प्रेम पर कई फ़िल्म बन चुकी हैं। लैला-मंजनू कैसे थे? कहाँ के रहने वाले थे? इनके परिवार वाले क्या करते थे? कौन जानता है। लेकिन ये बात सही है कि इन दोनों प्रेमियों ने अपनी अन्तिम साँस श्रीगंगानगर जिले में ली। श्रीगंगानगर जिले के बिन्जोर गाँव के निकट लैला-मंजनू की मजार है। दोनों की मजार पर हर साल जून में मेला लगता है। मेले में नवविवाहित जोडों के साथ साथ प्रेमी जोड़े भी आते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि बँटवारे से पहले पाकिस्तान साइड वाले हिंदुस्तान से भी बहुत बड़ी संख्या में लोग मेले में आते थे। मेले के पास ही बॉर्डर है जो हिंदुस्तान को दो भागों में बाँट देता है। राजस्थान का पर्यटन विभाग इस स्थान को विकसित करने वाला है। लैला-मंजनू की मजार को पर्यटन स्थल बनाने के लिए दस लाख रुपये खर्च किए जायेंगें।अगर इस स्थान का व्यापक रूप से प्रचार किया जाए तो देश भर से लोग इसको देखने आ सकते हैं। मजार सुनसान स्थान पर है ,इसलिए आम दिनों में यहाँ सन्नाटा ही पसरा रहता है।
लैला -मंजनू की इसी मजार के बारे में जी न्यूज़ चैनल पर प्राइम टाइम में आधे घंटे की स्टोरी दिखाई गई। सहारा समय भी इस बारे में कुछ दिखाने की तैयारी कर रहा है।

Tuesday, 24 February, 2009

नफरत ना करना मेरी मां




उठ मां,
मुझ से दो बातें करले
नो माह के सफर को
तीन माह में विराम
देने का निर्णय कर
तू चैन की नींद सोई है,
सच मान तेरे इस निर्णय से
तेरी यह बिटिया बहुत रोई है,
नन्ही सी अपनी अजन्मी बिटिया के
टुकड़े टुकड़े करवा
अपनी कोख उजाड़ दोगी!
सुन मां,
बस इतना कर देना
उन टुकडों को जोड़ कर
इक कफ़न दे देना,
ज़िन्दगी ना पा सकी
तेरे आँगन की चिड़िया
मौत तो अच्छी दे देना,
साँसे ना दे सकी ऐ मां,मुझे तू
मृत रूप में
अपने अंश को देख तो लेना
आख़िर
तेरा खून,तेरी सांसों की सरगम हूँ,
ऐ मां,मुझसे इतनी नफरत ना करना
---
लेखक--डॉ० रंजना
३१६/अर्बन एस्टेट सैकिंड
भटिंडा[पंजाब]
यह कविता डॉ० रंजना के भाई डॉ० विवेक गुप्ता के बताकर यहाँ पोस्ट की गई है।

Sunday, 22 February, 2009

ये क्या है? भ्रम,चमत्कार,या अन्धविश्वास

कई बार ऐसा होता है जब हमें अलग सा लगता या महसूस होता है। लेकिन व्यस्त जिंदगी के कारण हम उस बात को भुला देते हैं,या जान बूझकर उसकी चर्चा नहीं करते। कल शनिवार को भी एक परिवार ने ऐसा ही देखा और महसूस किया । परिवार ने अपने पूजा घर में शनि देवता की फोटो के सामने रुई से बनी पतली सी जोत जगा दी। कुछ क्षण के बाद जोत ने कुछ भिन्न प्रकार का रूप ले लिया। जोत की पतली सी नोक पर "कुछ" दिखाई देने लगा। काले रंग का यह "कुछ"साफ साफ दिखाई दे रहा था। अब जोत की अग्नि उसके चारों तरफ़ से आने लगी। जबकि इस प्रकार की जोत की लौ पतली और सीधी होती है। जिस घर में ऐसा हुआ वे पूजा पाठ में यकीन तो करते हैं लेकिन अन्धविश्वासी नहीं हैं। जो कुछ है वह आंखों के सामने है इसलिए उसको केवल कपोल कल्पना भी नहीं कहा जा सकता। अब आख़िर ये है क्या? ये जानने की जिज्ञासा के चलते ही उसका विडियो यहाँ पोस्ट किया गया है। ताकि समझदार,ज्ञानीजन ये बता सकें की आख़िर ये है क्या।

Saturday, 21 February, 2009

छुआछूत के मामले बढे हैं देश में

नेशनल एस सी/एस टी कमीशन के चेयरमेन बूटा सिंह ने लोकसभा चुनाव श्रीगंगानगर से लड़ने की बात कही है।
उन्होंने प्रेस से कहा कि वे १९८० में इंदिरा गाँधी के साथ इस इलाके में आए थे। तब मैं उनका ड्राईवर,चपरासी,सचिव सबकुछ था। तब मैंने इस इलाके को देखा। तब से मेरे मन में इस इलाके की नुमाइंदगी करने की इच्छा है। बूटा सिंह के अनुसार इस इलाके का उतना विकास नहीं हुआ जितना होना चाहिए। उन्होंने बताया कि आजादी के बाद से छुआछूत के मामलों में बढोतरी हुई है। छुआछूत कई जगह तो साफ नजर आता है। उन्होंने कहा कि आज तक इस कानून में किसी को भी सजा नहीं हुई है। चेयरमेन ने बताया कि कमीशन अपनी रिपोर्ट जल्दी ही सरकार को देगा।
बूटा सिंह के अनुसार राजस्थान के विधायक किरोडी लाल मीणा और पूर्व केन्द्रिय होम मिनिस्टर शिवराज पाटिल ने भी उनसे अपने इलाके से चुनाव लड़ने का ऑफर दिया है। लेकिन मैं श्रीगंगानगर से चुना लड़ना चाहता हूँ। बूटा सिंह ने राजस्थान के जालौर लोकसभा क्षेत्र का संसद में प्रतिनिधित्व किया है। जालौर अब सामने सीट हो गई जबकि श्रीगंगानगर एस सी के लिए रिजर्व है।

Friday, 20 February, 2009

शाप दे दिया दादा ने

---- चुटकी----

सोम दा ने
दे दिया
सांसदों को शाप,
सदन में करते हो
हंगामा, इसलिए
हार जाएं आप।

विचार नही स्टार चाहिए

---- चुटकी----

विचार नहीं,खेल
फ़िल्म और टीवी के
बड़े स्टार चाहिए,
सांसद बनना है तो
आप भी हमारे
झंडे के नीचे आइये।

Thursday, 19 February, 2009

गीतकार नीरज ने किया विमोचन

राजस्थान प्रशासनिक सेवा के अधिकारी राजेन्द्र कुमार मीणा के प्रथम काव्य संग्रह आबशार-ऐ-अश्क का विमोचन प्रख्यात गीतकार,कवि डॉ० गोपाल दास नीरज ने अलीगढ में किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि इस पुस्तक की सुगंध राजस्थान में ही नहीं पूरे देश में फैलेगी। श्री नीरज ने कहा कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में आज पतन का दौर चल रहा है। राजनीति और साहित्य दोनों भ्रमित हैं। आज पैसा ही सब कुछ हो गया है। श्री मीणा ने कहा कि श्री नीरज जी के आशीर्वाद से ही मेरी कल्पनाएँ पुस्तक के रूप में आ सकीं हैं। अलीगढ में कवि सम्मलेन भी हुआ। [विडियो में पुस्तक का विमोचन करते हुए श्री नीरज,कवि सम्मलेन में कविता पाठ करते हुए श्री नीरज जी, श्री मीणा जी।]

श्री नीरज जी शब्दों में"श्री राजेन्द्र कुमार मीणा 'राजेन्द्र' की कुछ कवितायें मैंने सुनीं। श्री राजेन्द्र एक प्रशासनिक अधिकारी हैं। आश्चर्य की बात है कि अपनी प्रशासनिक सेवा में अति व्यस्त रहते हुए भी सौन्दर्य और प्रेम की तथा प्रेम पीड़ा की जो कवितायें लिखी हैं वैसी मैंने पहले न तो कभी सुनीं और न कभी किसी पत्रिका में पढ़ी। वे सहज कवि हैं और ऐसा लगता है कि कवितायें उन्होंने नहीं बल्कि उनके भीतर बैठी हुई गहन अनुभूतियों के कारण स्वंय लिख-लिख गईं। वे मैथिल कोकिल विद्यापति के आधुनिक रूप में मुझे सदा ही प्रभावित करते रहेंगें और सदा याद आते रहेंगें। इस आधुनिक विद्यापति को मेरी हार्दिक शुभकामनायें।" यह सब श्री मीणा की पुस्तक में लिखा हुआ है।

आतंकवाद के दो नाम

---- चुटकी---

पाकिस्तान
कहो या
तालिबान,
आतंकवाद हैं
दोनों नाम।

Wednesday, 18 February, 2009

ये जो जिंदगी है

दिल्ली के निकट बहादुरगढ़ और रोहतक के बीच एक क़स्बा है सांपला। इस कस्बे या मंडी में यूँ तो हजारों लोग रहते हैं लेकिन जिक्र केवल नत्थू राम बंसल का। इसकी वजह तो है ही। वजह उनकी और उनके परिवार वालों की हिम्मत। सालों पहले नत्थू राम दो तीन दुर्घटनाओं का ऐसा शिकार हुआ कि उसकी कमर के नीचे का हिस्सा एक प्रकार से पत्थर का हो गया। बस, यह आदमी खड़ा और पड़ा रहता है। बिस्तर पर पड़ा रहेगा या बैसाखी लेकर खड़ा रहेगा। पैर मुड़ते नहीं,कमर झुकती नहीं। घर में ऐसे चलता है जैसे कीड़ी। कहीं जाना हो तो सामान ढोने वाले रिक्शा में "लाद" कर ले जाया जाता है। इसके बावजूद इनको ना तो जिंदगी से कोई शिकायत है ना भगवान से। इनका पूरा परिवार है, समाज में रुतबा है। इनकी पत्नी हो या बेटे किसी ने आज तक उनको ये अहसास नही होने दिया कि वे "पत्थर" हो चुके। उनकी एक आवाज से उनके परिवार वाले उनके पास पहुँच जाते है। ऐसे आदमी उन लोगों के लिए प्रेरणा होतें है जो थोड़ा बहुत चला जाने के गम में ज़िन्दगी से हार मान कर बैठ जाते हैं। इनके घर वालों ने इनका इलाज तो बहुत करवाया मगर जब कुछ बात नहीं बनी तो इसी को प्रसाद मान कर स्वीकार कर लिया। इनको इन दो लाइनों के साथ सलाम-- ना मजा मौज उड़ाने में है,ना मजा गम उठाने में है,गर है चैन "मजबूर", तो दिल को समझाने में है।"

इनका जिक्र भी लाजिमी है

दिल्ली से श्रीगंगानगर के लिए चलने वाली इंटरसिटी एक्सप्रेस ट्रेन में ऐसा बहुत कुछ देखने और महसूस करने को मिला जिसका जिक्र करना लाजिमी सा लगा। ट्रेन के डिब्बे में मैले -कुचैले,फटे कपड़े पहने, बदन पर लटकाए कोई लड़का डिब्बे की सफाई करता हुआ कुछ पाने की आस में हाथ फैलाता है। कोई हाथ पर रखता है कोई उसकी और से मुहं फेर लेता है। कई दयालु यात्री उसको खाने को दे देते हैं। पत्थर के दो छोटे टुकड़े बजाकर गाना सुनाते हुए कोई लड़का या लड़की डिब्बे में आकर आपका ध्यान अपनी ओर खींच सकता है। गाने चाहे कानों में रस ना घोले मगर पत्थर के दो टुकड़े बजाने के अंदाज औरआवाज अवश्य आंखों , कानों को अच्छे लगते हैं। कुछ समय बाद आपको चार पाँच साल के लड़का लड़की जिम्नास्टिक करते दिखेंगें। ये सब कुछ ना कुछ करके, या अपनी टूटी फूटी कला का प्रदर्शन करके कुछ पाने के लिए यात्रियों के आगे हाथ फैलाते है। इनको भिखारी नही कहा जा सकता। कई यात्री इनसे सहानुभूति दिखाते हैं कई इनके बारे में अपमान जनक टिप्पणी करते हैं। ये तो साबित है कि ये भिखारी नही हैं। सम्भव है कभी ऐसा हो कि इनमे से कोई किसी फ़िल्म का पात्र नजर आए। क्योंकि भारतीय गरीबी की तो विदेशों में बहुत अधिक मांग है। कुछ भी हो ये बच्चे भिखारियों से तो बेहतर हैं। फ़िर भी ऐसे बच्चों के लिए किसी ना किसी को तो कुछ करना ही चाहिए। कहीं ऐसा ना हो कि इनका जीवन इसी प्रकार इस ट्रेन में ही समाप्त हो जाए।
ट्रेन के शौचालयों में अश्लील वाक्य भी बहुत अधिक मात्र में लिखे हुए थे। लिखने वाले कितनी गन्दी मानसिकता के होंगें यह आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन ट्रेन की सफाई के जिम्मेदार अधिकारियों/कर्मचारियों को तो इनको साफ़ कर देना चाहिए।

Friday, 13 February, 2009

मान गया पाक

---- चुटकी---

लो जी
मान गया पाक,
मगर उसका
बिगाड़
क्या लेंगें आप।

वेलेंटाइन डे,दूसरों की बहिन बेटियों के साथ

कोई भी आदमी ये तो पसंद करताहै कि वो किसी सुंदर सी लड़की/महिला के साथ इधर उधर मटर गश्ती करे,फ़िल्म देखने जाए, होटल में बतियाए,ऐश मरे। लेकिन ऐसा करने वालों में से कोई ये बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कोई उसकी बहिन बेटी के साथ ऐसा करे। मतलब साफ़ है कि इस मामले में सभी के पास दो तराजू होते है। लेने के लिए अलग देने के लिए अलग। यही मानसिकता वेलेंटाइन डे का समर्थन करने वालों की है। वेलेंटाइन डे के हिमायती अगर इसको इतना गरिमामय मानते हैं तो वे अपनी बेटियों और बहिनों को आगे करे। लड़कों को पीले चावल देकर बुलाएँ कि आओ भई मनाओ वेलेंटाइन डे, हाजिर हैं हमारी बहिन बेटियाँ। फ़िर उनको पता लगेगा कि इसका क्या मतलब होता है। जो आजादी तुम दूसरों के लिए मांग रहे हो वह अपनी लड़कियों और बेटियों को क्यों नहीं देते? कौन रोकता है तुमको वेलेंटाइन डे मनाने से मगर शरुआत घर से हो तो लोगों को भी प्रेरणा मिलेगी। कथनी और करनी में अन्तर तो नही होना चाहिए। भारत की गरिमा को कम करने में लगे ये मक्कार लोग वेलेंटाइन डे के बहाने दूसरों की बहिन बेटियों को निशाना बनाते है। मीडिया से जुड़े वो लोग जो ऐसे लोगों को कवर करतें हैं उनसे सीधे शब्दों में पूछे कि क्या उनकी लड़की भी वेलेंटाइन डे मनाने अपने घर से निकली है। या उसको ऐसा करने की इजाजत दी गई है। सच तो ये है कि " जाके पैर न फटी बेवाई,वो क्या जाने पीर पराई" जब वेलेंटाइन डे के समर्थक लोगों की लड़कियां अपने यारों के साथ ऐश करती हुई उनको दिखेगी तब उनको पता चलेगा कि ये क्या है। आज मिडिल क्लास परिवारों में वेलेंटाइन डे को लेकर चिंता रहती है कि पता नहीं कौन क्या कर दे। छोटे शहरों के अभिभावकों को फ़िक्र अधिक रहता है।

Wednesday, 11 February, 2009

चड्डी साड़ी में घमासान

---- चुटकी----

वेलेंटाइन डे पर
चड्डी और साड़ी में
हो गया घमासान,
कोई जीते कोई हारे
दाव पर लगी है
नारी की शान।

उधार का आयातित प्रेम दिवस

हमारे महान हिंदुस्तान को पता नहीं क्या हो गया या कुछ सिरफिरे लोगों ने कर दिया कि सड़े गले,दुर्गन्ध वाले विदेशी रीति रिवाजों को अपने अन्दर समाहित करने में अपने आपको गौरवान्वित महसूस करता है। यहाँ बात करेंगें वेलेंटाइन डे की। जिस हिंदुस्तान में सदियों से प्रेम,प्रीत,स्नेह,लाड ,प्यार की नदियाँ बहती रहीं हैं वह यह डे प्रेम सिखाने आ गया। या यूँ कहें कि प्रेम के नाम पर गन्दगी फैलाने आ गया। हिंदुस्तान तो प्रीत का दरिया है। कौनसा ऐसा सम्बन्ध है जो प्रेम पर नहीं टिका हुआ। सोहनी-महिवाल को कोई भूल सका है क्या? राधा -कृष्ण की प्रीत की तो पूजा जाता है। मीरा की भक्ति भी तो प्रेम का ही एक रूप थी। सुदामा-कृष्ण,श्रीराम और बनवासी निषाद राज की मित्रता का प्रेम क्या प्रेम नहीं था। अर्जुन से प्रेम था तभी तो कृष्ण ने उसका सारथी बनना स्वीकार किया। लक्ष्मण-उर्मिला के प्यार को लिखने के लिए तो कोई शब्द ही नहीं है। श्रवण कुमार का अपने माता-पिता के प्रति प्यार तो इतिहास बना हुआ है। श्रीराम और सुग्रीव ने अपनी मित्रता के प्रेम को कैसे निभाया कौन नहीं जानता। भाई के प्रति भाई के प्रेम की कहानी तो रामचरितमानस के पन्ने पन्ने पर है। प्रेम तो वह है जिसका कोई आदि और अंत ही नहीं है।ये नाम तो वो हैं जो आम हिन्दुस्तानी जानता है। इसके अलावा भी ना जाने कितने ही नाम होंगें जो प्यार को अमर बनाकर चले गए। पता नहीं संस्कार वान हिन्दुस्तानियों ने अपने सास्वत सत्य प्रेम को छोड़कर झूठे,क्षणिक वेलेंटाइन मार्का प्यार को क्यों अपनाना शुरू कर दिया जो यह कहता है बस एक दिन प्रेम करो और उसको भी लड़कियों से जोड़ दिया। जबकि हिंदुस्तान में तो हर पल हर क्षण प्रेम, प्यार प्रीत की गंगा बहती है।
पता नहीं यह आयातित प्रेम हमारे लड़के-लड़कियों को कहाँ लेकर जाएगा। एक दिन के प्रेम में शालीनता,गरिमा की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती। जबकि हिन्दुस्तानी प्रेम की तो नीवं ही गरिमा और शालीनता है। किसी ने कहा है--"ये कोई खेल नहीं है जिंदगी के जीने का, लगी है शर्त तो सिक्का उछल कर देखो"।

Tuesday, 10 February, 2009

फाल्गुन में सावन की सी रिमझिम

प्रकृति और दिल पर किसी का कोई बस नहीं है। ये दोनों कब क्या कर बैठें कोई नहीं जानता। श्रीगंगानगर में आज ऐसा ही हुआ। सुबह का नजारा प्रकृति का सौन्दर्य अपने अन्दर समेटे हुए था। आसमान में यहाँ से वहां तक काली घनघोर घटायें इस सौन्दर्य में चार चाँद लगाती दिखीं। हलकी बूंदा बांदी शहर को धीरे धीरे भिगोने में लगी हुई थी। आज फाल्गुन मास का पहला दिन था। लेकिन प्रकृति सावन का दृश्य दिखाने को लालायित थी। रात को यह पोस्ट लिखने तक मौसम ऐसा ही बना हुआ था। ठण्ड जो लगभग विदा ले चुकी थी फ़िर से द्वार पर आ खड़ी हुई। भोर से अब तक शहर प्रकृति के इस अनुपम उपहार से भीगता रहा।सूरज ने बादलों की ओट में ही पूर्व से पश्चिम तक का अपना सफर तय किया। आज सूरज की नहीं चली। दिन में भी सांझ का अहसास होता रहा। टाइम ने बताया कि यह शाम का वक्त है। वैसे श्रीगंगानगर की सर्दी और गर्मी दोनों गजब की होती है। सर्दी में न्यूनतम तापमान शून्य के आसपास और गर्मी में अधिकतम तापमान ५० डिग्री सेल्सियस के निकट रहता है। आज लोगों ने प्रकृति का आनंद भी लिया और परेशान होने वाले इस बरसात से परेशान भी हुए। मगर प्रकृति को इस से क्या!

जाते जाते नई शुरुआत

श्रीगंगानगर के निवर्तमान एसपी आलोक विशिस्ट आज जाते जाते यहाँ एक नई शुरुआत कर गए। उन्होंने मीडिया कर्मियों को अनौपचारिक बातचीत के लिए बुलाया। उन्होंने जिस प्रकार से मीडिया को बुलाया था बात भी उसी प्रकार की , बिना लाग लपेट के। वे उस कुर्सी पर नहीं बैठे जो उनके लिए होती है। हालाँकि अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ने उनसे बार बार अपनी चेयर पर बैठने का आग्रह किया लेकिन वे नहीं माने। उन्होंने साफ कहा कि वे आज केवल अनौपचारिक बात चीत के लिए ही आयें हैं। श्री आलोक जी किसी की आलोचना से बचे, इलाके की जनता की सकारात्मक सोच की सराहना की। इसी बात चीत के दौरान नवनियुक्त एसपी उमेश चन्द्र दत्ता भी आ गये। एक घंटा तक विभिन्न मसलों पर बात चीत हुई। उन्होंने श्रीगंगानगर इलाके को बहुत अच्छा बताया। सभी मीडिया कर्मियों ने उनको गुड लक कहा। श्रीगंगानगर में ऐसा पहली बार हुआ जब निवर्तमान एसपी ने मीडिया कर्मियों को अनोपचारिक बात चीत के लिए बुलाया। कई साल पहले पत्रकार संगठन जाने वाले एसपी को विदाई पार्टी देकर नए एसपी का स्वागत किया करते थे।
नए एसपी उमेश चन्द्र से भी इसी मूड में चर्चा हुई। उनसे पूछा गया कि क्या वे भी जिला कलेक्टर की तरह अपना मोबाइल फोन नम्बर जनता के लिए सार्वजानिक करना चाहेंगे? उन्होंने कहा कि वे पहले यहाँ के सिस्टम को समझ कर फ़िर इस बारे में कोई बात करेंगें। नए एसपी मूल रूप से चंडीगढ़ के रहने वालें हैं।

Monday, 9 February, 2009

भिखारिन के जज्बे को सलाम


आदमी थोड़ा देकर बहुत नाम कमाने की भावना दिल और दिमाग में रखता है। बहुत से ऐसे भी हैं जो सौ रुपल्ली का सामान अस्पताल में बाँट कर दो सौ रूपये उसके प्रचार में लगा देते हैं। मगर यह पोस्ट उनको समर्पित नहीं है। यह समर्पित है उस भिखारिन को जिसको भिखारिन कहना ही नही चाहिए। श्रीगंगानगर से प्रकाशित "प्रशांत ज्योति" दैनिक अखबार में एक ख़बर है। ख़बर यह बताती है कि एक भिखारिन ऐसे लोगों के लिए लंगर लगाती है जो असहाय है। इस भिखारिन के जज्बे को सलाम करते हुए यही कहना है कि हमें ऐसे लोगों से कुछ तो प्रेरणा लेनी ही चाहिए। "मजबूर" ने अपनी किताब "डुबकियां" में लिखा है---"कुछ देने से सब कुछ नहीं मिलता मजबूर,सब कुछ देने से कुछ मिलता है जरुर"। वे ये भी कहतें हैं--" हर जिंदगी है मुश्किल,हर जिंदगी है राज, मुझ से हजार होंगें,मुझ सी दास्ताँ नहीं"।

पाक में जिन्ना,भारत में राम जी

---- चुटकी----

पाक में जिन्ना
भारत में
श्रीराम जी,
आडवानी जी का
पता नहीं
कैसे बनेगा काम जी।

Sunday, 8 February, 2009

पाक,तालिबान,जेहाद और कसाब

---- चुटकी----

पाक,तालिबान,
जेहाद और कसाब,
इसके सिवा
न्यूज़ चैनलों में
और
क्या है जनाब।

Friday, 6 February, 2009

मंदी में महंगा सामान

--- चुटकी----

क्रिकेट खिलाड़ियों के
खूब लगे दाम,
इतनी मंदी में
इतना महंगा
मिला सामान।

--गोविन्द गोयल

धन्यवाद आपका और उनका


सीमा जी, आपका धन्यवाद। धन्यवाद इस बात का कि आपने मुझे इस बात की जानकारी दी कि मेरे ब्लॉग और पोस्ट "मृत शरीर का दान" की चर्चा बैंगलोर से प्रकाशित "दक्षिण भारत" नामक अखबार में हुई है। धन्यवाद अखबार के सम्पादक का भी जिन्होंने मृत देह दान करने वाले परिवार की भावना को समझा और उसे अपने अखबार में स्थान दिया। उम्मीद है कि मेरा विनम्र धन्यवाद अखबार संचालकों तक पहुँच जाएगा।

Thursday, 5 February, 2009

मृत शरीर को दान किया

किसी ने कहा है " हट के दिया,हट के किया याद रहता है। हमारे हिंदुस्तान मृत शरीर के प्रति आदर मान का भाव है। डैड बॉडी चाहे किसी भी धर्म से सम्बन्ध रखने वाले इन्सान की हो उसका निरादर नही किया जाता। हम तो बॉर्डर पर रहतें है इसलिए जानते हैं कि बॉर्डर पर जब कोई पाक घुसपैठिया मारा जाता है तो उसकी डैड बॉडी का भी उसके धर्म के अनुरूप अन्तिम संस्कार किया जाता है। यह तो आम बात है। आज जिसके बारे में लिखा जा रहा है वह जरा हट के है। श्रीगंगानगर में एक परिवार में एक महिला की मौत हो गई। मौत ही एक सच्चाई है बाकी सब झूठ है। महिला के परिजनों ने डैड बॉडी का अन्तिम संस्कार नहीं करके उसको मैडिकल कॉलेज को दान कर दिया । मृत महिला के परिजनों ने शव की अन्तिम यात्रा निकली। अर्थी को मरघट तक लेकर गए । वहां उसके अन्तिम दर्शन करके डैड बॉडी को मेडिकल कॉलेज को दान में दे दिया गया। जिस देश में धर्म के प्रति अंध विश्वाश हो। उस देश में अपने परिजन की मृत देह का अन्तिम संस्कार करने की बजाय उसको किसी के हवाले कर देना अपने आप में जरा हट के है। हजारों साल पहले एक महात्मा दाधीच ने भी अपने शरीर को दान कर दिया था। "तन का बंधन दुनियादारी,रूह का मिलना प्यार,डाल झुके तो जीत तुम्हारी,उछल तोड़ना हार।

Wednesday, 4 February, 2009

फाल्गुन कैसे गुजरेगा जो नहीं आए भरतार

दरवाजे पर खड़ी खड़ी
सजनी करे विचार
फाल्गुन कैसे गुजरेगा
जो नहीं आए भरतार।
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फाल्गुन में मादक लगे
जो ठंडी चले बयार
बाट जोहती सजनी के
मन में उमड़े प्यार।
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साजन का मुख देख लूँ
तो ठंडा हो उन्माद,
"बरसों" हो गए मिले हुए
रह रह आवे याद।
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प्रेम का ऐसा बाण लगा
रिस रिस आवे घाव
साजन मेरे परदेसी
बिखर गए सब चाव।
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हार श्रंगार सब छूट गए
मन में रही ना उमंग
दिल पर लगती चोट है
बंद करो ये चंग।
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परदेसी बन भूल गया
सौतन हो गई माया
पता नहीं कब आयेंगें
जर जर हो गई काया।
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माया बिना ना काम चले
ना प्रीत बिना संसार
जी करता है उड़ जाऊँ
छोड़ के ये घर बार।
----
बेदर्दी बालम बड़ा
चिठ्ठी ना कोई तार
एस एम एस भी नहीं आया
कैसे निभेगा प्यार।

Tuesday, 3 February, 2009

पचास घंटे का अवरोध

श्रीगंगानगर में ५० घंटे बाद इन्टरनेट सेवा बहाल हो सकी। शनिवार की शाम अचानक भारतीय दूर संचार निगम की केबल कटने से बहुत बड़े इलाके में इन्टरनेट ठप्प हो गई। इस से बड़ी संख्या में उपभोग्ता प्रभावित हुए। दो दिन तक साइबर बंद रहे। लेकिन नगर से प्रकाशित होने वाले कई प्रमुख अखबारों में इस बात का कोई जिक्र तक नहीं। जबकि निगम के ऑफिस में इस बारे में शिकायतों का अम्बार लगा हुआ था। सन्डे को ऑफिस बंद था कुछ नही हो सका। सोमवार को ऑफिस खुला तब खराबी को ठीक करने का काम शुरू हुआ जो रात को ओके हो सका। सन्डे को तो निगम की फोन सेवा भी अस्त व्यस्त रही। इन्टरनेट की चाल तो अभी भी नोर्मल नहीं हो पाई है। हाँ इतना जरुर है कि कुछ करने लायक जरुर हो गए। साइबर संचालकों को दो दिन ठाले बैठे रहना पड़ा, पर निगम को क्या फर्क पड़ता है।