Thursday, 31 March, 2011

खेल खेल में अनेकता में एकता

श्रीगंगानगर-कमाल है,खेल खेल में भारत एकता के सूत्र में बंध गया। क्रिकेट ने वह कर दिखाया जो राजनेताओं की अपील,धर्मगुरुओं के उपदेश, टीचर्स की क्लास नहीं कर सकी। देश के कण कण से एक ही स्वर सुनाई दे रहा था, हम जीत गए। भारत विजयी हुआ। जाति,धर्म,समाज,पंथ सब गौण हो गए। रह गया तो भारत और उसकी पाक पर विजय का उल्लास। दिन के समय किसी काले पीले तूफान के कारण गहराती शाम का दृश्य तो याद है। लेकिन आधी रात को दिन जैसा मंजर पहली बार देखा। १९८३ में भी हमारी टीम रात को ही वर्ल्ड कप जीती थी। ऐसा कोलाहल तो तब भी नहीं दिखाई,सुनाई दिया। तीन दशक में क्रिकेट बादशाह होकर हम पर राज करने लगा। क्रिकेट खेलों का राजा हो गया। इसके आगे कोई नहीं ठहरता। क्रिकेट जन जन के दिलों में धड़कता है। वह उम्मीद है। जीवन है। जुनून है। कारोबार है। ग्लेमर है। उसकी जीत भारत के अलग अलग कारणों से परेशान जनता को खुश कर देती है चाहे कुछ देर के लिए ही सही। इससे अधिक और कोई खेल किसी को दे भी क्या सकता है। जो क्रिकेट दे रहा है, वह तो तमाम खेल मिल कर भी नहीं दे सकते। इसे क्रिकेट की महानता कहो या जनता का पागलपन,दीवानगी। क्रिकेट ऐसा ही रहेगा। अन्दर तक जोश भर देने वाला। सभी आवश्यक कामों को मैच के बाद तक टाल देने वाला। क्रिकेट मैच की जीत जनता के अन्दर नवजीवन का संचार करती है। हार मायूसी। खिलाडी हार के बाद उतने मायूस नहीं होते जितने लोग। क्रिकेट मैच ने कई घंटे तक सबको एक जगह रुकने के लिए मजबूर कर दिया।सरकार ने मैच देखने के आदेश नहीं दिए थे। कोई टोटका भी नहीं था कि मैच देखने से जीवन में खुशहाली आएगी। इसको देखने से कोई ईनाम भी नहीं मिलना था। इसके बावजूद सब व्यस्त थे। मैच के अंतिम क्षणों में जब भारत की जीत साफ दिखाई दी तो हल्ला गुल्ला शुरू हो गया। जैसे ही पाकिस्तान हारा भारत की जीत का उल्लास घरों के कमरों से लेकर सड़कों पर उतर आया। टीं,पीं,पों ,हुर्रे,हूउ...... के मस्ती भरे कोलाहल ने कई घंटे से पसरे सन्नाटे की गिल्लियां उड़ा दी। जो सड़क,गली सुनसान थी वहां पटाखों के शोर ने विजय के तराने गाए। गलियों में भारत माता की जय का उदघोष करती टोलियाँ घरों की चारदीवारी,बालकोनी में खड़े बच्चों को जोश दिला रही थी। फिर ना तो माता पिता की डांट की परवाह ना सुबह होने वाली परीक्षा की चिंता। सबके स्वर एक हो गए। विजय का उदघोष और तेज होकर वातावरण को आह्लादित करने लगा। कई घंटों से ठहरा हुआ भाव रूपी जल लहरें बन ख़ुशी से नृत्य करने लगा। क्रिकेट की अ,आ,इ ..... नहीं जानने वाला पूरे माहौल को अचरज से देख रहा था। उसके चेहरे पर ख़ुशी थी। ख़ुशी इस बात की कि वह जानता है कि यह भारत में ही संभव है जहाँ खेल खेल में अनेकता को एकता में बदला जा सकता है। क्रिकेट तो एक बहाना है। असल में यह हमारे संस्कार है। हमारी संस्कृति है। जिस पर युगों युगों से हमें गर्व है और हमेशा रहेगा।

Wednesday, 30 March, 2011

लाटरी में निकली भारत की जीत



जयपुर--सुबह का वक्त। कृषि विपणन मंत्री गुरमीत सिंह कुनर अपने सरकारी आवास पर आज कुछ अधिक व्यस्त हैं। दोपहर बाद मंडियों के आरक्षण की लाटरी निकालनी है। इसके लिए अधिकारियों को आदेश निर्देश दिए। लाटरी की सोच के से उनके दिल में आइडिया आया। भारत -पाक के लिए लाटरी निकालने का। सेमी फ़ाइनल में दो दिन बाकी थे । मन में उत्सुकता आज ही कि कौन जीतेगा!वह दो दिन बाद होने वाले नतीजे को अभी जान लेना चाहते है। मगर आज बताए कौन कि जीत किसकी होगी। इस बारे में भविष्यवाणी करना असंभव है। तो क्या करे! दिल है की मानता नहीं। यही है क्रिकेट का जुनून। वह जादू जो सभी को सम्मोहित कर लेता है। । क्रिकेट यह नहीं देखता कि सामने कौन है। आम क्रिकेट प्रेमी या मंत्री। बस सर चढ़ कर असर दिखाना शुरू कर देता है । श्री कुनर ने दो पर्चियां बनाई। एक पर लिखा भारत,एक पर पाकिस्तान। दोनों को मेज पर रख दिया। अपनी नन्ही सी पोती ख़ुशी को बुलाया। पर्ची उठवाई। जो पर्ची ख़ुशी ने मासूमियत से उठाई उस पर भारत लिखा था। मतलब, सेमी फ़ाइनल भारत की टीम जीतेगी। पर्ची कोई ऑक्टोपस नहीं,लेकिन गुरमीत सिंह को विश्वास है। मन को तसल्ली हुई। एक मासूम बालिका जो क्रिकेट को ना तो जानती है ना समझती है उसके हाथ ने जो पर्ची उठाई उस पर भारत है, इसलिए भारत की जीत की सम्भावना है। इस प्रकार के टोटके हिन्दूस्तान में बहुत किये जाते हैं। असल मैच में क्या होगा? कौन जानता है। परन्तु श्री कुनर का दिल यह मानता है कि जीत भारत की होगी। बहुत कम लोग जानते हैं कि गुरमीत सिंह कुनर क्रिकेट मैच देखने के बहुत शौकीन हैं। आज से नहीं पहले से ही। यह उनके द्वारा अपने घर में निकलवाई गई लाटरी से भी साबित होता है। बेशक उस लाटरी का कोई मतलब नहीं मगर यह बात यह तो साबित करती ही है कि उनको क्रिकेट कितना भाता है। सरकारी काम काज में व्यस्त हों तब भी वे बीच बीच में ये ये कहना नहीं भूलते " स्कोर की हो गया"।


सचिवालय,जहाँ से सरकार राजस्थान को चलती है,दोपहर तक तो खूब चहल पहल रही। घडी की सुइयां ढाई की तरफ बढ़ी तो वहां सन्नाटा पसरना शुरू हो गया। जो मंत्री आये वे लौट गए। वही बचे जिनका वहां होना जरुरी था। किसी ने नेट पर अपने आप को मैच से अपडेट रखा किसी ने फोन करके मिलने वालों से मैच का हाल जाना।हर कोई सेमी फ़ाइनल से जुड़ा हुआ था। मैच के दौरान भारत-पाक के प्रधानमंत्रियों सहित खास वी वी आई पी को टी वी पर देखने की उत्सुकता दर्शकों में रही। शरद पवार, विजय मालिया,आमिर खान, विवेक ओबेराय,प्रीटी जिंटा सहित टी वी के कलाकार जरुर दिखे। किन्तु मनमोहन सिंह, गिलानी, राहुल गाँधी आदि ना दिखे। कहते हैं कि सुरक्षा कारणों से उनको नहीं दिखाया गया। कुंअर बेचैन कहते हैं--तेरा सोचा हुआ ही तेरा है, और सब है उधर का बंधन। तू तो बस आत्मा है इतना समझ,छोड़ ये जीत हार का बंधन।

Sunday, 27 March, 2011

खेल खेल है जंग केवल जंग

श्रीगंगानगर--राजस्थान के पूर्व मंत्री गुरजंट सिंह बराड़ और वर्तमान मंत्री गुरमीत सिंह कुनर बेशक बहुत अधिक नहीं पढ़े मगर वे बहुत अधिक कढ़े हुए जरुर है। उन्हें अनुभव है, जीवन का। समाज का। सम्बन्धों का। राजनीति का। अमीर होने का मतलब भी वे अच्छी तरह जानते हैं तो गरीब के दर्द की जानकारी,अहसास भी उनको है। तभी तो लाखों रूपये इन्वेस्ट करके शुरू किये गए स्पैंगल पब्लिक स्कूल के उद्घाटन अवसर पर इन्होने वह दर्द बयान किया। गुरजंट सिंह बराड़ ने कहा कि स्कूल में कम से कम पांच प्रतिशत बच्चे कमजोर वर्ग से होने चाहिए। ऐसे बच्चों की शिक्षा का इंतजाम स्कूल करे। उन्होंने शिक्षा को व्यापार ना बनाये जाने की बात कही। मंत्री गुरमीत सिंह कुनर ने स्कूल में कमजोर वर्ग के विद्यार्थियों की संख्या पच्चीस प्रतिशत होनी ही चाहिए। ताकि गरीब बच्चों को उच्च वर्ग के बच्चों के साथ पढने का अवसर मिल सके। श्री कुनर ने तो यहाँ तक कह दिया कि भविष्य में उनको यहाँ आने का मौका मिला तो वे देखेंगे कि ऐसा हुआ या नहीं। मंच संचालक शिव कटारिया ने प्रबंध समिति की और से श्री कुनर को भरोसा दिलाया कि उनकी बात का पालन होगा। सभी को यह देखना है कि भविष्य में क्या होगा। इस स्कूल में और उस खेल के मैदान में। उस मैदान में जहाँ खेल को दो देशों की जंग में बदलने का खेल हो रहा है। जी हाँ बात भारत-पाक में ,ओह!सॉरी, भारत-पाक की क्रिकेट टीमों की जो दो दिन बाद सेमीफ़ाइनल खेलेंगी। वैसे तो यह सेमी फ़ाइनल है लेकिन भारतियों और पाकिस्तानियों के लिए तो यही फ़ाइनल है। यह समझ से परे है कि देश प्रेम,राष्ट्र भक्ति इन टीमों के मैच के समय ही क्यों उबाल खाती है। खेल आज चाहे बहुत बड़ा कारोबार बन गया हो, शिक्षा की तरह किन्तु असल में तो यह सदभाव,भाईचारा,प्रेम,प्यार ,आपसी समझ के साथ रिश्तों में गर्माहट बनाये रखने का पुराना तरीका है। मनोरंजन तो है ही। जंग एकदम इसके विपरीत है। जंग में सदभाव,भाईचारा,प्रेम प्यार सबकुछ ख़तम हो जाता है। वहां मनोरंजन नहीं मौत से आँखे चार होती है। खेल में रोमांच होता है। लेकिन इन दोनों टीमों का मैच तनाव लेकर आता है। खिलाडियों से लेकर दर्शकों तक। स्टेडियम में खिलाडी सैनिक दिखते हैं। किसी को चाहे भारत की धरती से रत्ती भर भी प्यार,अपनापन ना हो,वह भी पाक टीम से अपनी टीम की हार को सहन नहीं करता। बंगलादेश, कीनिया,कनाडा किसी भी पिद्दी से पिद्दी टीम से पिट जाओ बर्दाश्त कर लेंगे। पाक से हार हजम नहीं होती। वह बल्लेबाज हमको अपनों से अधिक प्यारा है जो पाक गेंदबाज को पीटता है। गेंदबाज वह पसंद जो पाक खिलाडी को आउट करे। पाक टीम के सामने कमजोर कड़ी साबित होने वाला कोई भी खिलाडी हमारी नजरों को नहीं भाता चाहे वह क्रिकेट का भगवान सचिन ही क्यों ना हो। निसंदेह जिन देशों में क्रिकेट खेली जाती है वहां क्रिकेट प्रेमियों में भारत -पाक टीमों में होने वाले मैच के प्रति उत्सुकता रहती है। अरबों का व्यापार होता है। इसके बावजूद यह खेल है। इसको जंग में नहीं बदलना चाहिए। जंग नफरत पैदा करती है। खेल नफरत को मिटा कर प्यार जगाता है। कम शब्दों में खेल खेल है और जंग केवल जंग। खेल खेल में जंग का होना किसी के लिए किसी भी हालत में ठीक नहीं। किसी कवि ने कहा है--सारी उम्र गुजारी यों ही, रिश्तों की तुरपाई में ,दिल का रिश्ता सच्चा रिश्ता ,बाकी सब बेमानी लिख।

Friday, 25 March, 2011

चेहरे पर धूल है

श्रीगंगानगर--हिन्दूस्तान भागां वाला है जिसे प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह जैसा हीरा मिला। श्रीगंगानगर जिला अपने आप पर इसलिए इतरा सकताहै कि उसके यहाँ रुपिंदर सिंह जैसा भला इन्सान एस पी है। देश का प्रधानमंत्री नहीं जानता कि उसकी मण्डली क्या क्या गुल खिला रही है। हमारे एस पी को भी इस बात की कोई जानकारी नहीं होती कि कौन आ रहा है,कौन जा रहा है। दोनों बहुत ही सज्जन इन्सान हैं। बच्चे की तरह एकदम मासूम,निर्दोष। गाँधी जी के पद चिन्हों पर या तो मुन्ना भाई चला या ये चल रहे हैं। मुन्ना भाई से भी बढ़ कर हैं ये। बुरा मत देखो,बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो को इन्होने आत्मसात कर लिया है। इनको कोई कुछ बताता नहीं तो ये भी उनसे कुछ पूछते नहीं। हिसाब बराबर। हालाँकि प्रधानमंत्री और एस पी को कोई मेल नहीं हैं। लेकिन क्या करें? भारत-पाक सीमा से सटे इस जिले में गाड़ियाँ हथियार लिए लोगों को लेकर दनदनाती रही। श्रीगंगानगर जिला मुख्यालय पार करके आगे और आगे चले गए। किसी को कानों कान खबर नहीं हुई। संभव है पुलिस को यह अचम्भा ना लगे, मगर एक आम आदमी तो यह सोचता ही है कि कमाल है, डोली लेकर आने वाली गाड़ी को तो रोक कर ईनाम की इच्छा जताई जाती है। ट्रकों को रुकवा कर उनसे माल लेकर ही जाने दिया जाता है। पता नहीं कौन कौनसा विभाग बोर्डर पर जाँच पड़ताल करता है। इसके बावजूद ये बिना किसी की जानकारी में आये चले गए। चलो मान लो ये विभाग अब बिलकुल ऐसा नहीं करते। आजकल किसी से टोका टाकी नहीं की जाती। फिर पुलिस का ख़ुफ़िया तंत्र तो है। पुलिस के अतिरिक्त और भी हैं जो खुफियागिरी करते हैं। जब उनमे से किसी को यह पता ही नहीं चला तो फिर काहे की खुफियागिरी! ऐसा राम राज्य! दूसरे राज्य की पुलिस ने सूचना नहीं दी! नहीं दी तो नहीं दी। आप कार्यवाही करते। उनको अपना रुतबा दिखाते। जब उनको यहाँ के ढोल में पोल का पता लग गया तो वो इसकी परवाह क्यों करने लगे। जरुरत पड़ी तो सूचना हो गई वरना अपने बन्दे लेकर चले जाते। किसको खबर होनी थी। एस पी हैरान हैं कि दूसरे राज्य की पुलिस बिना सूचना दिए आ गई। हम इसलिए हैरान,परेशान हैं कि हमारी पुलिस को पता ही नहीं चला कि कई लोग हथियार लेकर सड़कों पर "घूम" रहे हैं। ये तो ग्रह-नक्षत्र ठीक थे। पडौसी थे। खुदा ना करे इनके स्थान पर दूसरी साइड वाले पडौसी होते तब क्या होना था! तब यह कहते कि हमें पडौसियों ने बताया नहीं कि हम आ रहे हैं। इस प्रकार की भलमनसाहत से परलोक भी नहीं सुधरता। क्योंकि परलोक भी तभी सुधरता है जब इस लोक में आप लोगों का यही लोक सुधारने,संवारने में अपने आप को लगा दें। वह हो नहीं रहा। किसी ने कहा है,--इल्जाम आइने पर लगाना फिजूल है, सच मान लीजिये चेहरे पर धूल है।

Friday, 18 March, 2011

फाल्गुन कैसे गुजरेगा सजनी करे विचार

दरवाजे पर खड़ी खड़ी
सजनी करे विचार,
फाल्गुन कैसे गुजरेगा
जो नहीं आए भरतार
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फाल्गुन में मादक लगे
जो ठंडी चले बयार,
बाट जोहती सजनी के
मन में उमड़ा प्यार
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साजन का मुख देख लूँ
तो ठंडा हो उन्माद ,
महीनों हो गए मिले हुए
रह रह आवे याद
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प्रेम का ऐसा बाण लगा
रिस रिस जावे घाव ,
साजन मेरे परदेसी
बिखर गए सब चाव
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हार श्रृंगार छूट गए
रही ना कोई उमंग,
दिल पर लगती चोट है
कौन बजा रहा चंग
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परदेसी बन भूल गया
सौतन हो गई माया,
पता नहीं कब आएंगे
जर जर हो गई काया
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माया बिना ना काम चले
ना प्रीत बिना संसार,
जी करता है उड़ जाऊ
छोड़ के ये घर बार
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वाह! फाल्गुन,अहा! फाल्गुन

श्रीगंगानगर-अहा! फाल्गुनवाह!फाल्गुनफाल्गुन कुछ है ही ऐसाठंडी बयार हर उस प्राणी को मदमस्त कर देती है मन फाल्गुन को जानता होकहते भी हैं कि फाल्गुन में तो जेठ भी देवर लगता हैऐसे ही निराले मौसम में जब पंचायती धर्मशाला में होली का कार्यक्रम हुआ तो मोर पीहू पीहू करने लगे और लोग लगे थिरकनेधर्मशाला की हर ईंट गारे को यह सुहानी शाम याद रहेगी अगले फाल्गुन तककार्यक्रम बेशक तय समय से लेट शुरू हुआ मगर हुआ खूबचंग धमाल पहले हुआमेहमान लेट आयेउनको होली पर श्रद्धांजलि, सॉरी बड़े लोग थे इसलिए श्रद्धांजली के में बड़ी मात्रा ठीक रहेगी,दी गईयह प्राप्त करने वालों में अधिकृत रूप से पूर्व सांसद शंकर पन्नू, प्रमुख पति हंस राज पूनिया, बार संघ के अध्यक्ष इंदरजीत बिश्नोई,व्यापार मंडल के अध्यक्ष नरेश शर्मा, सभापति जगदीश जांदू, पूर्व विधायक हेतराम बेनीवाल ,कैप्टेन राजेन्द्र सिंह, शेखावटी विकास समिति के सुभाष तिवाड़ी और पत्रिका के अरविन्द पांडे थेइनको "हार" पहनाये गएजनवादी महिला समिति की दुर्गा स्वामी को माला पहनाने की जिम्मेदारी एडवोकेट भूरा मल स्वामी को दी गईजब वो फूलों की माला लेकर चले तो किसी ने एक माला दुर्गा स्वामी को भी थमा दीदोनों ने एक दूसरे को माला पहना कर सबके सामने अपनी शादी को री न्यू कियागंजों के प्रतिनिधि के रूप में वहां आये समाज सेवी वीरेंद्र वैद और एडवोकेट चरनदास कम्बोज को भी नमन किया गयाशेखावटी विकास समिति के कलाकारों ने अपनी हर अदा से सभी को मोहित कियाचंग पर थाप हो या धमालनाचने का अंदाज हो या मोर की पीहू पीहूसब कुछ एकदम परफेक्ट थाउनकी प्रस्तुतियों ने कौन ऐसा था जिसको उनके साथ थिरकने के लिए मजबूर, नहीं मजबूर नहीं, लालायित नहीं कियावरिष्ठ पत्रकार कमल नागपाल कहा करते थे कि हर इन्सान में एक कलाकार होता ही हैयही तो यहाँ दिखाई दियाहेतराम बेनीवाल ने अपनी उम्र के हिसाब से ठुमके लगाएहंस राज पूनिया ने ढफ यूँ पकड़ा जैसे कलाकार पकड़ते हैंउनके कदम उसी के अनुरूप थिरकेबाद में उन्होंने कुछ लाइन भी गाईऐसा लगा जैसे उनका संकोच खुले,मौका मिले तो धमाल मचा सकते हैंके सी शर्मा के निराले डांसिंग अंदाज ने आनंदित किया उनके चुटकुले से ठहाके गूंजेनरेश शर्मा ,रमेश नागपाल भी मजेदार नाचेफिर तो एक एक करके सबको नचाया गयाजिनकी पत्नी भी थी [ वहां मौके पर] वे जोड़े से नाचेकिसी और ने होली की मस्ती जानकर हाथ पकड़ने की कोशिश की तो उसको निराशा हुईसंपत बस्ती की एक महिला ने नृत्य कियाउनके लिए बार कौंसिल के अध्यक्ष नवरंग चौधरी ने भूरा मल स्वामी के कहने पर मंच पर विराजित मेहमानों से ईनाम इकट्ठा कियाउस महिला की तो होली बढ़िया हो गईमनीष- सिमरन ने बहुत आकर्षित कियाउनको भी नकद ईनाम मिलाइस चक्कर में जो तवज्जो चंग धमाल के कलाकारों को मिलनी चाहिए थी वह उनको नहीं मिल पाईफिर भी यह शाम तो उनकी ही थी सो उनके ही नाम रहीकार्यक्रम ख़तम होने के बाद मैंने ११ साल के बेटे से पूछा , कैसा लगा प्रोग्राम? उसका कहना था, चंग धमाल कम बाकी सब अधिक थाजबकि उसको यह समझ नहीं आया था कि वो गा क्या रहे हैंहोली की कुछ लाइन--रंगों में भीगी सखियाँ ,मुझसे यूँ बोली, साजन के संग बिना री,काहे की होलीघर घर धमाल मचाए ,सखियों की टोली, साजन परदेश बसा है कैसी ये होली

Thursday, 17 March, 2011

रंग छोड़ कर अंग लगा ले

लगा गुलाल
गया मलाल
मन में उमड़ा
प्रीत का ज्वार
दोनों मिले
बाहें पसार

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आया भरतार
लगाया ना रंग ,
प्यासी गौरी
लग गई अंग

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रंग छोड़ के
अंग लगा ले
हो जाउंगी लाल रे,
मौका और
दस्तूर भी है
तू
बात ना मेरी टाल रे

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झीने कपड़ों पर
साजन ने मारी
प्रेम भरी पिचकारी ,
सकुचा कर
अपने आप में
सिमट गई सजनी
सारी की सारी
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Monday, 14 March, 2011

फाल्गुन कैसे गुजरेगा

दरवाजे पर खड़ी खड़ी
सजनी करे विचार,
फाल्गुन कैसे गुजरेगा
जो नई भरतार
हार श्रृंगार छूट गए
रही ना कोई उमंग ,
दिल पर लगती चोट है
बंद करो ये चंग

घोड़े की नाल की मार्केटिंग

श्रीगंगानगर --वो जमाना और था जब कोई बेहतर सामान बिना किसी अधिक एड और पीआर शिप के बिकता थामार्केटिंग का कोई दवाब नहीं थाअब वक्त बदल चुका हैआप को अपने सामान की बढ़िया से बढ़िया मार्केटिंग करनी होती हैउसमे भी तरीके रोचक,नए हों तो बात अधिक लोगों तक पहुँचती हैपत्रकारिता में प्रोडक्ट को बेचने के फंडे पढाए और समझाए नहीं जातेयहाँ तो ज़िक्र करेंगे काले घोड़े की नाल बेचने के नए ढंग काकाले घोड़े की नाल का तंत्र,मन्त्र,ज्योतिष में बहुत अधिक महत्व हैकई प्रकार के टोटके उस से किये जाते हैंबहुत से इन्सान इसको घर के बहार टांगते हैंबहुत से छल्ला बनाकर अंगुली में पहनते हैंइसका मिलना मुश्किल होता हैअब इसको आसन बना दिया है एक तरकीब नेगत कई सप्ताह से शहर के अलग अलग इलाके में किसी सड़क के किनारे एक या दो काले घोड़े खड़े दिखाई देते हैंउनके साथ होते हैं उनके पालक युवकघोड़े के पास ही एक दो नाल पड़ी होती हैंएक युवक घोड़े के खुर को पकड़ कर ऐसा कुछ कर रहा होता है जैसे खुर से अभी अभी नाल गिरी हो और वह उसके स्थान पर दूसरी नाल लगा रहा हैआज घर घर में टेंशन हैहर प्राणी थोड़े या अधिक अवसाद में हैमुस्कुराना भूल गया हैपरेशानी से छुटकारा पाने की चिंता उसे हर पल लगी रहती हैऐसे में जैसे ही उसे काला घोडा,नाल दिखाई देती है तो उसके कदम,वाहन धीमे हो जाते हैंवह देखता हैयही तो घोड़े वाले चाहते हैंसबके सामने है,काला घोडा, असली नालमोल भाव शुरू होता हैजैसी सूरत वैसे दामढाई सौ से आरम्भ होकर सौ रूपये तक जाते हैंबहुत मुश्किल से खोजबीन ,लम्बे इंतजार के बाद भी जो असली घोड़े की नाल मिलनी आसान ना हो वह बिना किसी प्रयास के सुलभ हो जाये तो इन्सान उसे खरीद ही लेता हैऐसा हो भी रहा हैमीरा मार्ग,रवीन्द्र पथ,भगत सिंह चौक, भगत सिंह चौक और गंगा सिंह चौक के बीच सहित अनेक इलाकों में इस प्रकार घोड़े की नाल बेचीं जा रही हैइस से बढ़िया किसी वस्तु की मार्केटिंग और क्या हो सकती है! इसको कहते हैं जानदार,शानदार,दमदार पीआर शिपज्योतिष के लिहाज से यह नाल कितनी पुरानी होनी चाहिए इसको लेने और देने वाले जानेबेचने वाला तो क्या जाने उसको तो अपना माल बेचना हैहम ये नहीं कहते कि वह किसी से कोई धोखा कर रहा हैवह तो बस लोगों की भावनाओं को अपने लिए कैश कर रहा हैवैसे ज्योतिष विद्या के माहिर लोगों का ये कहना है कि घोड़े की नाल जितनी पुरानी हो उतना ही बढ़ियाऐसा नहीं कि एक दिन चलाई और उतारकर बेच दीऐसी नाल अधिक असरदार हो ही नहीं सकतीयह नाल अधिक से आधिक घिसी हुई होनी चाहिएघिस घिस कर घोड़े की नाल का रंग एक दम चमकने लगता है ऐसे जैसे कि वह लोहा नहीं स्टील होवैसे किसी के भाग्य को कोई बदल नहीं सकताकई बार अच्छी दवा काम नहीं करती एक चुटकी राख से मर्ज ठीक हो जाता है

Sunday, 13 March, 2011

छोटी छोटी बातें

श्रीगंगानगर--जिंदगी में छोटी छोटी बातें भी बहुत रस प्रदान करती हैंरस कैसा! ये पढ़ने,सुनने वाले पर निर्भर करता हैकहते हैं -जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत ........... । जयपुर से रींगस के बीच आजकल अलौकिक दृश्य मन को पुलकित कर देता हैयह दृश्य है खाटू श्याम,खाटू नरेश के प्रति श्रद्धा रखने वालों कायात्रियों के रेले के रेले श्याम के रंग में रंगे खाटू के दरबार में जा रहे होते हैंइनके पास होती हैं बड़ी बड़ी ध्वजाएंअलग अलग रंगों की ये पताकाएं ऐसा आभास दिलाती हैं जैसे प्रकृति के सभी सुन्दर और शुभ रंग इनमे समाहित हो गए होंफाल्गुनी बयार में जब ये लहरातीं है तो उस सड़क से गुजरने वाले लोगों के दिलों में श्रद्धा,आस्था,भक्ति का समन्दर उमड़ने लगता हैजी करता है कि वह भी इन पथिको के साथ पथिक हो श्याम के रंग में रंग जायेलेकिन सभी तो बाबा के दरबार में पहुँच नहीं सकतेकहते हैं जिसको बाबा बुलाते हैं वही जाते हैंखाटू नरेश के इन बन्दों के लिए थोड़ी थोड़ी दूर पर ठहरने,चाय,पानी,अल्पाहार,भोजन की व्यवस्था हैबड़े बड़े सेठ सेवादार बनकर इन पथिकों को खिलते नहीं बल्कि मनुहार करके परोसते हैंजिनके पास ऐसा कुछ नहीं वह अपने घर के सामने से गुजरने वाले इन यात्रियों का पथ सुगम करने के लिए सबरी की तरह पथ साफ़ कर देता हैकिसी के प्रति आस्था,श्रद्धा का इस से बड़ा सबूत और क्या हो सकता है
जयपुर की ही एक और बात कर लेते हैंपुलिया कंट्रोल रूम के सामने तिराहे पर कई यातायात पुलिस के को बन्दे ड्यूटी पर हैंकई वाहनों के साइड में यह कह कर करवाते हैं कि उन्होंने ने नियमो का पालन नहीं कियावे ये भी कहते हैं कि ऐसा वे नहीं कहते बल्कि कंट्रोल रूम वाले इधर उधर लगे कैमरे में देख कर बताते हैंउनको रोका है तो चालान भी होगाबचने के रास्ते भी हैंएक बाइक वाले ने इंचार्ज से पूछा, क्या लगेगा? दो सौ, यातायात कर्मी बोलासाइड में आओ, बाइक वाले ने गरिमा दिखाईपुलिस वाला बेशर्मी दिखाता हुआ बोला, यहीं दे दोमेरे पास बहुत हैकोई चिंता नहींबाइक वाले ने वहीँ दो सौ रूपये दिएपुलिस वाले ने ठाठ से जेब गर्म कीपुलिस कंट्रोल रूम के सामनेजहाँ कैमरे लगे हुये हैंइन कैमरों में इस प्रकार के दो सौ रूपये तो शायद ही नजर आते होंरोका तो हमें भी थालेकिन यह कहकर कि आप तो काम के आदमी हो जाने दियाअब ये अभी तक समझ नहीं आया कि जो कैमरे नियमों का पालन ना करने की बात कर रहे थे वे ठीक कैसे हो गए?
नगर विकास न्यास की चेयरमैनी के लिए अनगिनत लोग सपने देख रहे हैंकिस के भाग में क्या है कौन जानता हैकिन्तु यह तो परम सत्य ही है कि गुरमीत सिंह कुनर के सम्बन्ध मुख्यमंत्री से बहुत की घनिष्ट हैंएक तरफ से नहीं दोनों तरफ सेसरकार में जिले के एक ही मंत्री हैइसके बावजूद चेयरमैनी के किसी भी तलबगार ने श्री कुनर से सम्पर्क नहीं किया हैचेयरमैनी के लिए मुख्यमंत्री श्री कुनर से बात करें या ना करें , ये अलग बात हैमगर इस में तो कोई संदेह नहीं कि श्री कुनर किसी नाम की सिफारिश करेंगे तो उस पर गौर तो अवश्य होगाविचार हमने दे दिया अब विमर्श वो कर लें जो न्यास का चेयरमैन बनने के प्रयास में हैंकिस के हाथ से क्या मिल जाये कौन जानता हैचलो होली की कुछ लाइन पढोये मेरी अपनी हैं। --" आया भरतार , ना लगाया रंगप्यासी गौरी ,लग गई अंग। "

Monday, 7 March, 2011

कैसे किया कमाल

बोफोर्स मामला बंद करने का
कैसे आया ख्याल,
आपकी मज़बूरी की
नहीं इस से बड़ी मिसाल
---
मजाक मजाक में बीत गए
कई अमूल्य साल,
सच बतलाना मनमोहन जी
ये कैसे किया कमाल

Saturday, 5 March, 2011

अपना लगने लगा शैतान

अन्दर से डर जाता हूँ
देख भला इन्सान ,
अपना सा लगने लगा
जो बैरी था शैतान।
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यही सोच कर सबके सब
होते हैं परेशान,
भ्रष्टाचार का कोई किस्सा
अब करता नहीं हैरान।
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गली गली में बिक रहा
राजा का ईमान ,
सारी उम्मीदें टूट गईं
अब क्या करें भगवान।


Friday, 4 March, 2011

बाकी तो बजाओ ताली


अशोक चव्हाण
सुरेश कलमाड़ी
ए राजा
पी जे थामस
बी एस लाली ,
प्रधानमंत्री तो
मजबूर हैं
बाकी तो
बजाओ ताली।

Thursday, 3 March, 2011

धन्य और सौभाग्यशाली धर्मपाल

श्रीगंगानगर--सौभाग्यशाली धर्मपाल धन्य हो गया। सौभाग्यशाली इसलिए क्योंकि वह पुलिस में हैं। धन्य इसलिए कि उसने अपने धर्म का पालन किया है। जब नाम धर्मपाल है तो उसका पहला फर्ज है धर्म का पालन करना। किसी पुलिस वाले का पहला धर्म क्या होता है! माल किसी का हो उसको अपना बनाना। यही धर्मपाल ने किया। चोरी की बाइक मिली,उसको अपना बना चलाया। इस से बड़ा धर्म पुलिस का कोई हो ही नहीं सकता। किसी को विश्वास नहीं तो थानों में जाकर देख लो। विभिन्न प्रकरणों में बरामद सामान कहाँ और कैसे जाता है! सॉरी! इस स्टोरी के धर्मपाल को आप पहचान ही गए होंगे। जो नहीं जानते उनकी सनद के लिए बता दूँ। धर्मपाल बस अड्डा चौकी का सिपाही है। उसे चोरी की बाइक मिली और भूल गया। धर्मपाल को पहली पंक्ति में सौभाग्यशाली बताया है। इसकी वजह ये कि अगर सौभाग्यशाली ना होता तो अब तक उसके खिलाफ कार्यवाही हो चुकी होती। धर्मपाल एक आम नागरिक होता तो उसको तुरंत ही थाने बुला लिया जाता। या कोई आकर ले जाता। उसका परिवार उन लोगों की चौखट पर नाक रगड़ रहा होता जो पुलिस तक अप्रोच रखते हैं। पुलिस की यह परम्परा है। इसी से उनका घर भरता है। पुरानी आबादी थाना प्रभारी है भी सी एम के मौहल्ले का. उनको सिफारिश करवाने के लिए तो खुद सी एम से ही अप्रोच करनी पड़ती। चूँकि वह पुलिस का सदस्य है इस कारण पहले जाँच होगी फिर कार्यवाही। इतना तो चलता है। घर की बात है। यह नियम केवल पुलिस सदस्य के लिए है। दूसरे के लिए तो पहले कार्यवाही फिर जाँच। पकड़ ही लिया तो कुछ ना कुछ तो मिलेगा ही। देना ही पड़ेगा। यह पुलिस है। यहाँ माया और काया कष्ट दोनों होते हैं। काया कष्ट से बचने के लिए माया का सहारा लिया जाता है फिर भी जो लिखा है वह तो भोगना ही पड़ता है। ये इस प्रकार के हर प्रकरण में होता है। बस, पता लग जाये कि चोरी का सामान किसके पास है ! किसने चोरी का सामान ख़रीदा है! चाहे उस आदमी से यह सब अनजाने में ही हुआ हो। समझो उसका तो बंटा धार हो गया। सिफारिश करने वाला भी दस बार सोचेगा। फोन करूँ,ना करूँ! पुलिस सच्ची है या सिफारिश करवाने आया बंदा! पुलिस को फोन करे तो इमेज धूमिल होने की आशंका. धर्मपाल आदरणीय, सम्मान योग पुलिस का अपना है । इनको अपने घर में दोनों में से कोई कष्ट होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। यही तो संयुक्त परिवार के फायदे हैं। एक सबके लिए,सब एक के लिए। जब अपना ही हम निवाला है तो उसको सफाई देने का हर किस्म का मौका दिया जायेगा। आखिर जाँच करनेवालों को भी तो अपना पुलिसिया धर्म निभाना है। धर्म को पालना अकेले धर्मपाल की ही जिम्मेदारी नहीं है। पूरी पुलिस फ़ोर्स की है। जब ये धर्म निभाएंगे तभी तो धर्मपाल बचेगा। धर्मपाल बचने का मतलब है धर्म का बचना। पुलिस धर्म का सुरक्षित,बेदाग,निष्पक्ष रहना। बड़ी कठिन परीक्षा की घडी आन पड़ी है पुलिस के कन्धों पर। उन कन्धों पर जिनपर पहले से ही अनेकानेक ऐसे मैडल रखे हैं । घबराओ नहीं। पुलिस ने इस प्रकार की घडी का पहले भी बहुत बार सामना किया। पुलिस अपने धर्म की रक्षा करने में हमेशा की तरह कामयाब होगी। सुनो! पूरी पुलिस एक स्वर में गा रही है--हम होंगे कामयाब........, मन में है विश्वाश। जय हिंद। रवीन्द्र कृष्ण मजबूर कहते हैं- खोट भरो,कोई चोट करो,सितम करो,अंधेर करो,बोतल से महफ़िल जमती है,गुंडों से खुल्ला मेल करो। सीधे -सादे जीवन को कुछ लोग हिमाकत कहते हैं।

Wednesday, 2 March, 2011

कौने कौने में महंगाई

डिब्बी से डिब्बे
और
कनस्तर से पीपे
तक ,रसोई के
कौने कौने में
फ़ैल गई महंगाई,
जिन्दगी की तरह
पल पल सिकुड़
रही है
आम आदमी की कमाई

Tuesday, 1 March, 2011

डायपर्स सस्ते होंगे,पेट भरना मुश्किल

श्रीगंगानगर--देश भर में बजट प्रस्तावों पर बहस हो रही है सत्ता पक्ष बल्ले बल्ले और विरोधी थल्ले थल्ले कर रहा है आम आदमी से थोड़े ऊपर की हैसियत वाले से लेकर बड़े बड़े व्यापारी, अर्थशास्त्री,विश्लेषक बजट का पोस्टमार्टम कर रहे हैं यह आदत भी है और करना जरुरी भी या यूँ समझो कि यह सब भी बजट का ही एक हिस्सा है फिर भी डायपर्स इन सबकी नजर से बच गया डायपर्स! नहीं समझे! अरे! पोतड़ा वही पोतड़ा, जो दिन में कई कई बार बदला जाता था उसी को अब डायपर्स कहते है ऐसे भी समझ सकते है कि गरीब शिशु चड्डी की जगह जो लपेटता है वह पोतड़ा होताहै और पैसे वालों का शिशु जिसको पहनता है वह डायपर्स वित्त मंत्री ने जो बजट प्रस्ताव पेश किये हैं उसके अनुसार डायपर्स सस्ते हो जायेंगे अर्थात मंत्री जी को बजट बनाते समय पैसे वालों के वो शिशु भी याद रहे जो डायपर्स में हगनी,मूतनी करते हैं पोतड़ा तो सस्ता महंगा होता ही नहीं घर में जो बेकार, पुराने ,मजबूत कपडे होते हैं,वही पोतड़ा बनता है पोतड़ा डायपर्स नहीं जिसको यूज करके थ्रो किया जाये संभव है जो पोतड़ा बाप ने पहना हो वही उसके बेटे को भी मिल जाये इसलिए इसको बजट में किसी भी रूप में शामिल करने की कोई तरकीब थी ही नहीं संभव है यह सबको मजाक लगे लेकिन हम उतने ही गंभीर हैं जितने वित्त मंत्री जी हमें तो यह नहीं पता कि देश में कितने बच्चे डायपर्स का इस्तेमाल करते हैं उन्होंने तो हिसाब लगाया या लगवाया ही होगा कि डायपर्स सस्ते करने से कितने करोड़ परिवारों को राहत मिलेगी! ताकि उनके वोट तो अपने पाले में गिने जा सकें सवाल ये नहीं कि कितने घरों में इसका इस्तेमाल होता है प्रश्न ये कि आखिर ये हो क्या रहा है जिसकी जेब में पैसा है उसको कोई तकलीफ सरकार की किसी भी घोषणा से नहीं है उधर गरीब आदमी सरकार के हर बजट के समय अपनी जेब संभालने की कोशिश ही करता रह जाता है डायपर्स हो या पोतड़ा उतना जरुरी नहीं जितना पेट में रोटी,दूध। आज कुछ करोड़ लोगों को छोड़ कर अन्य रोटी,दूध के लिए किस प्रकार से सुबह से शाम तक खटते हैं यह किसी से पर्दा नहीं है। पोतड़े लायक मेम्बर के अलावा सभी इसी काम में लगते हैं, तब भी कभी पूरी रोटी नहीं तो कभी दूध नहीं। काले,सफ़ेद धन की बात से दूर एक साधारण परिवार किस तरह से अपना घर चलाता है ये किसी मंत्री को क्या पता! आज के दिन करोड़ों परिवारों में शिक्षा,स्वास्थ्य उतना महत्व नहीं रखता जितना रोटी। उनके दिमाग से रोटी की चिंता मिटेगी तब कुछ और सोचेंगें। वित्त मंत्री डायपर्स में अटक गए। जैसे इसके बिना जिंदगी बेकार है। ये ना हो तो पोतड़े से काम चल सकता है। जिनके पास पोतड़े तक का इंतजाम नहीं होता,उनके बच्चे भी जिंदा रहते हैं। किन्तु रोटी,दूध के बिना जीवन की गाड़ी अधिक दूर तक नहीं जा सकती। यह ईंधन है। भूखे पेट तो भजन भी नहीं हो सकते। इसलिए रोटी की चिंता थोड़ी आप भी करो सरकार। कुछ ऐसा करो ताकि जिंदगी महंगाई के सामने बौनी ना लगे। वरना तो ....... जैसा चल रहा है चलेगा ही। समर्थ का कौन कुछ बिगाड़ सकता है। जिसकी यहाँ बात हो रही है वह तो ना तीन में ना तेरह में। अंत में वर्तमान मौसम पर दो पंक्तियाँ--रिमझिम-रिमझिम बूंदे पड़ती,ठंडी चले बयार रे, आजा अब तो गले लग जा छोड़ सभी तकरार रे।

गाली देना नहीं सिखाया जाता पुलिस को



श्रीगंगानगर-- पुलिस कर्मियों द्वारा किसी को गाली देना एक आम बात है। समाज में भी यही कहते सुना जाता है कि पुलिस वालों को ट्रेनिंग के समय गाली निकालना भी सिखाया जाता है। लेकिन यह सच नहीं है। राजस्थान के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक [ प्रशिक्षण] सुधीर प्रताप सिंह ने आज प्रेस को बताया कि ट्रेनिंग में गाली देना नहीं सिखाया जाता। एक मीडिया ने उनसे इस बारे में प्रश्न किया था। वे श्रीगंगानगर में जिला पुलिस का वार्षिक निरीक्षण करने के लिए यहाँ आये हुए हैं। श्री सिंह ने बताया ट्रेनिंग में वह सब कुछ शामिल किया जा रहा है जिसकी बदलते हालातों में जरुरत है। उनके अनुसार आर्थिक अपराधों की बढती संख्या तो देखते हुए पुलिस को भी इसी के अनुरूप तैयार किया जा रहा है। पुलिस के प्रति अविश्वास के संदर्भ में श्री सिंह ने कहा कि पुलिस का आचरण बढ़िया हो तो अविश्वास नहीं हो सकता। पुलिस को विनम्र रह कर मजबूती से काम करना चाहिए। कानून में वे समस्त प्रावधान है जिसके सहारे वह हर प्रकार के अपराधी से मुकाबला कर सकती है। उन्होंने कहा कि पुलिस दिखनी चाहिए। जब तक पुलिस समाज में नजर नहीं आएगी तब तक उस पर आम आदमी का विश्वास नहीं जमेगा। सुधीर प्रताप सिंह दो दशक पहले श्रीगंगानगर के एस पी रहे थे। तब उन्होंने अपने काम,आचरण और सामाजिक सरोकार की वजह से बहुत ख्याति पाई थी। लोग आज भी यह कहते हुए सुने जा सकतेहैं कि एस पी तो सुधीर प्रताप सिंह था। तब उन्होंने नशे के आदी लोगों का नशा छुडवाने के लिए कई शिविर लगवाये थे। इसके लिए उन्होंने जोधपुर की माणकलाव संस्था का साथ लिया था। पुलिस की देख रेख में लगे इन शिविरों में जो लोग नशा छोड़ देते थे उनपर सम्बंधित थाना के लोग निगरानी भी रखते। ताकि वह फिर से नशा न करने लगे। हालाँकि श्री सिंह के जाने के बाद शिविर तो लगे। मगर अब यह परम्परा लगभग समाप्त ही हो गई है।
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