Saturday, 31 October, 2015

बेटी की पहली करवा चौथ पर लिखा.....


श्रीकृष्ण महाराज व रेखा माँ के प्रवचन सोमवार को



श्रीगंगानगर, 31 अक्टूबर: श्रीरामशरणम् आश्रम, गुहाना के श्रीकृष्णजी महाराज (पिताजी) व रेखा माँ 2 नवम्बर, सोमवार को श्रीगंगानगर आएंगे वे हनुमानगढ़ रोड,  बालाजी धाम के समीप स्थित श्रीरामशरणम् आश्रम में अमृतवाणी सत्संग व प्रवचनों से श्रद्धालुओं को आशीर्वाद प्रदान करेंगे। मुख्य सेवादार सुरेन्द्र मेहंदीरत्ता एडवोकेट ने बताया कि 2 नवम्बर, सोमवार को सांय 7 से 8.30 बजे तक सत्संग होगा। सत्संग के पश्चात् नाम दीक्षा के इच्छुक साधकों को नाम दीक्षा दी जाएगी। स्थानीय भक्तों में श्रीकृष्ण जी महाराज व रेखा माँ के आगमन पर खुशी की लहर दौड़ गई है। एडवोकेट सुरेन्द्र मेहंदीरत्ता, मोहनलाल कथुरिया, हरीश शर्मा, रमेश जगोता, देवकीनंदन मारवाह, रमेश मखीजा, राकेश गर्ग, भीम ओझा, विक्की चुघ, अशोक लूणा सहित समस्त सेवादार जोर-शोर से तैयारियों में जुटे हुए हैं। उन्होंने समस्त धार्मिक जनता से इस अवसर पर अधिकाधिक संख्या में पहुंचकर आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करने का आह्वान किया है। 

Friday, 30 October, 2015

पतियों को कुली बना दिया करवा चौथ पर


गोविंद गोयल
श्रीगंगानगर। दिन मेँ फेसबुक फ्रेंड का एक संदेश मिला। उसने लिखा, गोविंद जी, काहे की करवा चौथ! कैसी करवा चौथ! किस के लिए करवा चौथ! सब पति को पूरी तरह से कुली बनाने के बहाने हैं। उस पर तुर्रा ये कि ये सब आपके लिए ही तो है। फ्रेंड ने अपनी पीड़ा इन शब्दों मेँ बताई, सुबह से कुली बना रखा है मुझे। कभी मेहँदी लगवाने के लिए बीवी को लाद के ले गया बाइक पर। फिर ले के आया। कभी बाजार से ये लाना, वो लाना। हर बार मुझे ही जाना पड़ा। ड्रेस को मैच करता मेकअप का सामान। मेकअप को मैच करती ड्रेस। मतलब, ये, वो मेँ ही आधा दिन निकल गया। इतने मेँ ही सब्र नहीं किया बीवी ने , फिर ये भी बता दिया कि रात को कितने बजे घर आना है। क्या पहनना है। हैरान था मैं। समझ नहीं पाया कि ये व्रत पति की खुशहाली, खुशी, आनंद और उम्र बढ़ाने के लिए है या उसे सताने के लिए। बात तो ठीक थी । ऐसा दिखाई भी दे रहा था। लेकिन कोई कर भी क्या सकता है। ये व्रत है ही ऐसा। जो रखा तो पति के लिए जाता है और फिर सबसे अधिक परेशान भी वही होता है। तड़के चार बजे पेट भरने के लिए कल रात को ही इंतजाम कर लिया गया था। सुबह होते ही खटर, पटर शुरू हो गई। रात तक निराहार रहने के लिए तड़के पेट भर के व्रत की शुरुआत हुई। पति की नींद उड़ गई। बीवी  पेट भर के सो गई। नींद खुली तो सौ प्रकार के फरमान। जल्दी तैयार हो जाओ। कई काम है। व्रत है। मुझे तैयार होना है। ब्यूटी पार्लर जाना है। मेहँदी लगवानी है। व्रत की जल्दबाज़ी मेँ कैसा चाय नाश्ता मिला। उसकी दास्तां फिर कभी। लेकिन घर-घर व्रत की तैयारी का सिलसिला शुरू हो चुका था। जो वीर पति कुली नहीं बन सकते थे, उन्होने जल्दी घर से विदा ली। इधर उधर रेहड़ी पर विभिन्न प्रकार के लजीज आइटम से अपना शानदार नाश्ता किया। डकार ली और चले गए काम पर। जिनकी बीवियों ने कुली गिरि करवाई उनको नाश्ता तो क्या भोजन भी  नहीं मिला। क्योंकि महारानी तो सिंगार मेँ लग गई। सेवा चाकरी तो बीवी की करे। भोजन दूसरा कोई क्यूँ करवाए। यह तो वही बात हो गई, करवा चौथ का रखा व्रत, कई सौर रुपए कर दिये खर्च, सिंगार मेँ उलझी रही, घर से भूखा चला गया मर्द। नए जमाने के जोड़ों की दास्तां कुछ और अलग है। सिंगर गई। अब फोटो खींचो। फेसबुक पर डालो। व्हाट्सएप पर कभी पति को तो कभी सास, ननद  को भेजो। अगर ससुराल मेँ है तो सहेलियों और पीहर वालों को भेजी। बताना और दिखाना तो पड़ता ही है कि कैसे मनाई करवा चौथ। इस पूरी प्रक्रिया मेँ शाम हो जाती है। उसके बाद कोई काम नहीं। वैसे सुबह से काम किया ही क्या था? खैर कोई काम नहीं तो इधर उधर खड़ी हो चर्चा का दौर। रात  आ गई। चाँद का इंतजार। कभी पति छत पे तो कभी कोई घर का दूसरा सदस्य। क्योंकि खुद तो थकी हुई है। देरी चाँद कर रहा है, लेकिन आँखों आँखों मेँ कसूरवार पति को ठहराया जाता है। चाँद निकला तो छलनी नहीं मिली। उसे भी पति ही ढूँढे। पता नहीं इस व्रत को पति के नाम क्यों किया हुआ है? पति तो आम दिनों की तुलना मेँ अधिक पिसता है। क्योंकि बीवी तो सिवा व्रत के कुछ करती ही नहीं। कुछ कह दो तो वही पुरानी बात सुनने को मिलती है, बात बनाना आसान है, रह कर दिखाओ पूरा दिन भूखे। एक तो आपके लिए व्रत करो, ऊपर से ताने सुनो। दो लाइन पढ़ो—
चाहे मैं कितना भी पूरा हूँ

तुम बिन मगर अधूरा हूँ । 

Sunday, 25 October, 2015

दो गोल्डन चांस खो दिये गंगानगर के लोगों ने


श्रीगंगानगर। जनता जनार्दन की भावना को वंदन, उनकी श्रद्धा, विश्वास और उम्मीद का अभिनंदन। उनके ही निर्णय का सम्मान करते हुए बात शुरू करता हूँ। गंगानगर में तो राम राज्य है। किसी को कोई  पीड़ा नहीं। दर्द नहीं। अभाव नहीं। तभी तो कहीं से कोई आवाज नहीं आती। दर्द, पीड़ा, तकलीफ, अभाव होता तो कोई ना कोई अवश्य बोलता। किसी को कहता। अपना दर्द सुनाता ।  मगर शहर में सन्नाटा पसरा है। खामोशी का आलम है। इसी माहौल में ये सवाल जरूर किया जाता है कि ये हो क्या रहा है शहर में? चर्चा होती है, शहर लावारिस हो चुका है। कोई कुछ नहीं करता। ना कोई जन प्रतिनिधि बोलता है, ना प्रशासन में कोई काम होते हैं। कहने को तो अपनी अपनी जगह सब हैं। जन प्रतिनिधि भी, प्रशासन भी। मगर हम हैं कि हर बार मौका चूक जाते हैं। स्वाभिमान में लिपटे अपने अहंकार को पुष्ट करते हैं। परिणाम ये होता है कि हमें वो नहीं मिल पाता जो हमारा हक है। विकास की दौड़ में पिछड़ जाते हैं। मुंह ताकते रहते हैं दूसरों का। बातें बनाते हैं, ये नहीं हुआ। वो नहीं हुआ। ऐसा दो बार तो कर चुके।  एक बार 1993 के विधानसभा चुनाव में और दूसरी बार  2013 के चुनाव में। एक बार राधेश्याम गंगानगर को विजयी बना  कर। एक बार हरा कर। 1993 के चुनाव के समय सब जानते थे कि कांग्रेस उम्मीदवार राधेश्याम का सामना कर रहे बीजेपी के भैरों सिंह शेखावत मुख्यमंत्री बनेंगे। किन्तु हम कहाँ इस बात की परवाह करने वाले थे। दूरदृष्टि तो थी नहीं। विकास की सोच भी आस पास नहीं थी। ये  भी ख्याल नहीं था कि भैरों सिंह शेखावत  के विजयी होने का मतलब है, गंगानगर का महत्व बढ़ना। विकास के नए द्वार खुलना। तरक्की की नई कहानी लिखे जाने की शुरुआत होना। जिस व्यक्ति को एक मत से साथ दे विजयी बनाना था, उसे तीसरे नंबर पर ला पटका। हो गया गंगानगर का कल्याण। बताओ, हम से अधिक नादान और कौन होगा। जिसने घर आए विकास को वापिस भेज दिया। लक्ष्मी को ठोकर मार दी। इस परिणाम का ख्मयाज़ा आज तक भुगत रहा है गंगानगर। मजे की बात है कि हम गंगानगर वाले सबक भी नहीं सीखते, पुरानी घटनाओं से। विश्लेषण नहीं करते। अच्छा-बुरा नहीं सोचते शहर का। चुनाव के समय विकास की सोच नहीं रहती। उसके स्थान पर ये  सोच हावी हो जाती  है कि इस बार हराना किसको है। यही वजह रही कि हमने 2013 में भी वैसा ही कुछ कर दिया जो 1993 में किया था। इस बार राधेश्याम गंगानगर को हरा दिया। वह भी यह जानते हुए कि तमाम समीकरण बीजेपी के पक्ष में हैं। राधेश्याम गंगानगर जीतेंगे तो सौ प्रतिशत केबिनेट मंत्री बनेंगे। कुछ बनेंगे तो गंगानगर में भी कुछ ना कुछ जरूर होगा। मगर हम तो हम हैं। हम जिताने के लिए कम और हराने के लिए अधिक वोट करते हैं। हरा दिया। बैठा दिया घर। इस हार का दर्द आज तक लिए घूम रहे हैं राधेश्याम गंगानगर। कोई और होता तो ऐसे मौके की हार के बाद बिस्तर पकड़ लेता, लेकिन ये जनाब सक्रिय हैं। पता नहीं किस मिट्टी के बने हैं। अभी तो दो साल हुए हैं। शहर का हाल सबके सामने है। कोई बोल सकता है, लेकिन बोलता नहीं। कोई बोलता है तो उसकी सुनने वाला कोई नहीं। किस को कुछ पता नहीं कि बोलना कैसे है और करना क्या है। यूं तो हर रोज सवेरा होता है, लेकिन इस शहर के लिए सवेरा कब होगा, कोई नहीं जानता। आज चार  लाइन पढ़ो—

मुरदों की बस्ती मेँ जिंदा, कोई तो है 
व्यवस्था की आँख मेँ रड़कता, वोई तो है 
मुरदों को झिंझोड़ता रहता है जब तब 
चिंगारी को आग बनाने वाला वोई तो है। 

Friday, 23 October, 2015

मैं को मार पात्र को जीवंत करना मुश्किल होता है


श्रीगंगानगर। भगवा वस्त्र पहन लेने मात्र से कोई संत महात्मा नहीं बन जाता। ना ही दो चार लाइन लिखने से कोई पत्रकार बनता है। ऐसे ही किसी पात्र का  वेश धारण करने से ही कोई वह पात्र नहीं हो जाता। क्योंकि अभिनय हर किसी के वश मेँ नहीं है। अभिनय करना हो, तब भी नहीं कर पाते। जिस पात्र की भूमिका मेँ कोई है, उसे अपने हाव, भाव मेँ जिंदा रखना मुश्किल हो जाता है। क्योंकि इसके लिए मैं को खोना पड़ता है। भूलना होता है। किन्तु ऐसा हो नहीं पता। पात्र की वेषभूषा मेँ लिपा पुता व्यक्ति अपने अंदर यह बात नहीं बैठा पाता कि अब वो वो नहीं है जो वह असल मेँ है। बल्कि अब वो वो है जो नहीं है। उसे इस रूप मेँ  उसे जीवंत करना है, जो वह नहीं है। पात्रों पर मैं को हावी होते अनेक स्थानों पर देखा जाता है। दशहरा उत्सव के दौरान रामलीला मैदान मेँ तो यह मैं बिखरा पड़ा था। राम- रावण सहित अनेक पात्र हजारों हजार लोगों के बीच थे। असल मेँ वही तो इस उत्सव के प्राण थे। ये ना हों तो उत्सव निष्प्राण रहे। परंतु अफसोस लगभग दो घंटे के लिए भी पात्रों के अंदर का मैं नहीं निकला। वे अपने मैं को पात्र से अलग ही नहीं कर पाए। राम-रावण नहीं बन पाए। जिनको देखने लोग आए हुए थे। रामलाल, श्याम लाल आदि ही रहे। इसकी वजह भूमिका करने वाले पात्रों का विवेक तो होता ही हैं, साथ होता है वहां का माहौल। लोगों की मानसिकता । भीड़ का चरित्र। मीडिया की  कुछ नया पन पाने की ललक। यह सब पात्र के अंदर बैठे मैं  पर भारी पड़ते ही पात्र गुम हो जाता है। अब राम रावण को मग से पानी पिला रहा है। रावण का दल एक स्टाल पर पानी पीने जाता है। फोटो खिचवाता है। पात्र सेल्फी ले रहे हैं। दे रहे हैं। पात्र काला चश्मा पहन लेता है। ऐसे बातों से पात्रों की मर्यादा समाप्त होती है। व्यक्ति उस पात्र को जी नहीं पाता, जो वह बना है।  ये सब करने की  जरूरत नहीं होती। शौक पूरा करना भी हो तो मंच के पीछे किया जाता है ये सब। मंच पर जनता के सामने नहीं। यह उन पात्रों का अपमान है, जिनको जीया जा रहा है। लोगों का तो काम है भटकाना। मीडिया का काम है फोटो के लिए ललचाना। परंतु उस व्यक्ति के विवेक पर निर्भर है कि वो कितना पात्र को जीता है। वो भी समय था जब दशहरा मैदान मेँ राम और रावण की सेना बहुत ही गरिमापूर्ण तरीके से मैदान का चक्कर लगा युद्ध किया करती थी। लोग उस मिट्टी को प्रणाम किया करते थे, जहां राम, रावण का पात्र अपने पैर रखता था। अब तो चूंकि पात्र पात्र नहीं होता, इसलिए उसका वह मान, सम्मान और आदर भी नहीं होता। श्रद्धा भाव भी नहीं दिखाई देते। असल मेँ कसूर किसी का नहीं है। क्योंकि ये केवल रामलीला के मंच या दशहरा मैदान मेँ ही नहीं हो रहा। घर घर यही कहानी है। हम जीवन मेँ अपने वास्तविक पात्र को ही ठीक से नहीं निभा पाते तो ओढ़े हुए पात्रों को निभाने की क्षमता कैसे आ सकती है। कौन है जो दूसरे से खुश हो! पति को पत्नी मेँ कमी नजर आती है, पत्नी को पति नहीं भाता। बच्चों को माता-पिता खडूस लगते हैं, माता -पिता को बच्चे जिद्दी और नालायक। जितने रिश्ते हैं, ये सभी पात्र ही तो  हैं और दुनिया है रंगमंच। जब हम इनको निभाना सीख जाएंगे तो रामलीला का मंच हो या दशहरा का मैदान, वे सब पात्र जीवंत नजर आएंगे, जिनको व्यक्ति ओढ़ता है।  दो लाइन पढ़ो—

सबक तो हूं नहीं जो मुझे याद रखे कोई 
सफर मेँ मिला था, सफर मेँ छोड़ दिया। 

Thursday, 22 October, 2015

आरएसएस ने किया पथ संचलन






श्रीगंगानगर। आरएसएस ने आज सुबह पथ संचलन किया। यह संचलन नगर के मुख्य मार्गों पर हुआ। विभिन्न स्थानों पर लोगों ने पथ संचलन पर फूल बरसाए। यह आयोजन विजयी दशमी के मौके पर नेहरू पार्क से शुरू हुआ। पहले हथियारों का पूजन हुआ। प्रार्थना के बाद स्वयं सेवकों ने पूरे गणवेश मेँ पथ संचलन किया। सभी स्वयं सेवक कदम से कदम मिलाते हुए पूरे अनुशासन मेँ चल रहे थे। बैंड वाली टीम मधुर ध्वनियों से इस संचलन को और अधिक गौरवशाली बना रही थी। पी ब्लॉक सड़क पर नेमीचन्द गोयल परिवार के इन्द्र कुमार गोयल ने सपत्नीक फूल वर्षा की। उनके साथ विनय गोयल, दिनेश गोयल,  मोहित नारायण गोयल, निखिल गोयल, मोहनीश गोयल भी थे। जिस सड़क से भी पथ संचलन गुजरा , आस पास के लोग उसे देखने के लिए रुक गए। समाचार लिखे जाने के समय तक संचलन जा रहा था। 

Monday, 19 October, 2015

नवरात्रा उत्सव पर दुर्गा मंदिर मेँ डांडिया




श्रीगंगानगर। विनोबा बस्ती स्थित दुर्गा मंदिर मेँ  नवरात्रों के उपलक्ष मेँ खूब भीड़ होती है। मंदिर के आस पास खूब चहल पहल रहती है। पहली बार मंदिर मेँ हर शाम को डांडिया होता है। महिलाएं एक घंटे से भी अधिक समय तक डांडिया कर दुर्गा माता को रिझाने का प्रयास करती हैं। डांडिया ने दुर्गा मंदिर की रौनक और अधिक बढ़ा दी है। माता के दर्शनों को आने वाले नर-नारी और बच्चों को डांडिया भी आकर्षित करता है। डांडिया करने वाली बहुत ही सधे कदमों के साथ, पूरी लय से डांडिया करती हुई उसी मेँ खो जाती हैं। मंदिर सुबह और शाम को श्रद्धालुओं आना जाना लगा रहता है। महिलाओं की संख्या अधिक होती है। चुन्नी, फूल, नारियल, सुहाग की सामग्री दुर्गा को अर्पित कर उनकी पूजा करती हैं। नवरात्रा उत्सव के मद्देनजर मंदिर को काफी सजाया गया है। अंदर बाहर विशेष रोशनी की गई है। दूर गली तक बिजली की लड़ी लगाई गई है। मंदिर के आस पास स्थित दुकानों पर ग्राहकों की भी खूब आवक है। अष्टमी के लिए दुकानदारों ने कंजकों को भेंट मेँ दी जाने वाली सामग्री भी मँगवा ली है। ज्ञात रहे कि कई दशकों से दुर्गा मंदिर की खूब मान्यता है। शहर के हर क्षेत्र से लोग दुर्गा माँ के दर्शनों को आते हैं। 

हम से भूल हो गई, हमको माफी देई दो......



श्रीगंगानगर। श्रीगंगानगर विधानसभा के वे वोटर एक साइड मेँ खड़े हो जावें, जिन्होने विधानसभा चुनाव मेँ बीजेपी को हराया। अब सब साष्टांग प्रणाम की मुद्रा मेँ आ जाओ। नवरात्रों के दिन है, इसलिए यही मौका है शक्ति स्वरूपा, तमाम सिद्धियों, निधियों को  देने वाली, पाप हरने मेँ सक्षम देवी की आराधना करने का। यही समय है वरदान देकर किस्मत बदल देने क्षमता रखने वाली देवी की पूजा, वंदना करना का। साथ मेँ अर्चना, विनय और गुहार लगाने का भी। तो सब वोटर साष्टांग प्रणाम करो, राजस्थान की महादेवी, महारानी, मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को। याचना करो, हे देवी, हमें  माफ करो। गुहार लगाओ, महारानी इस बार क्षमा कर दो। इसी मुद्रा मेँ पड़े पड़े बोले, हम से भूल हो गई, हमको माफी देई दो। बोलो, शरमाओ, घबराओ मत। यही एक मात्र उपाए है, इस दुर्दशा से मुक्ति का। देवी बड़ी दयालु हैं। बता दो कि हमारी भूल के कारण हमारे उस गंगानगर की क्या दुर्गति हो गई, जिसे चंडीगढ़ बनना था। [बच्चा कभी तो बड़ा होगा ना!] हाथ जोड़ कर मीठी वाणी मेँ कहो, एक भूल का इतना बड़ा बदला मत लो माई। अरे, बता तो दिया कि महामाई बड़ी कृपालु हैं, इसलिए सब बता दो। हर कष्ट गिना दो। बता दो कि आपने छांट छांट कर ऐसे अफसर इधर भेजे हैं कि वे किसी की कोई परवाह ही नहीं करते। उनके लिए जनता का कोई अर्थ नहीं। उनके सामने जन प्रतिनिधि निरर्थक हैं। उपेक्षा, अपमान करना उनका शौक है। आपकी कृपा से वे ऐसे उद्दंड हो चुके कि उनको किसी का डर नहीं। कोई ज़िम्मेदारी नहीं समझते। शहर मेँ अराजकता की स्थिति है। नाजायज कब्जे खूब हैं, सड़कों का अता पता नहीं। कोई भी सरकारी दफ्तर ऐसा नहीं जहां आपकी कृपा ना बरस रही हो। बस, इस शहर की जनता ही निर्भाग है, जो तरस रहा है। शहर मेँ किसी का होना ना होना  सब बराबर हो चुका है। त्राहि त्राहि मची है शहर मेँ। ऐसी स्थिति तो तब भी नहीं थी, जब भैरों सिंह शेखावत यहां से हारे थे। पिछड़े तो थे, किन्तु इस तरह से नहीं। अब तो समझ नहीं आता कि कौनसी राह पकड़ें जो आपके दर को जाती हो।  आपका पूजारी कौन है, ये भी नहीं मालूम। पता चल जाए तो उसी के माध्यम से आपको चुनरी पहना कर अपनी कामना पूरी करवाने  मेँ शायद सफल हो सकें। हे माता, आपने कोई संकेत भी तो नहीं दिया, इस बाबत। महारानी, इस बार माफ करो। आइंदा गलती करने से पहले सोचेंगे। और हमारे पास कोई चारा भी तो नहीं है। अब तो ये धमकी भी नहीं दे सकते कि पंजाब मेँ मिल जाएंगे। केवल आपका ही सहारा और आसरा है। नवरात्रों मेँ आपके दर से कोई खाली नहीं जाता। सबकी झोली भरी जाती है। बस, एक बार गंगानगर की तरफ देख लो। करुणामई आँख से। दया भाव से। दयालु दिल से। देने के भाव से। महामाई, हमें कौनसा झंडी वाली कार चाहिए, हमें तो कुछ सड़कें  और जनहित की सोच रखने वाले, मान देने वाले अफसरों की दरकार है। आप तो अंतर्यामी हैं। सब जानती हैं कि क्या क्या जरूरत है। बस, हाथ उठाकर तथास्तु कद दो। आपका क्या जाएगा? हमारा मान रह जाएगा। जो हम खो चुके हैं। चुनाव कौनसा कुम्भ का मेला है, जो 14 साल बाद आएंगे। ये तो आए लो! इसलिए हमें क्षमा करो। हम पर दया करो। हमारी याचना को स्वीकार करो। हमारा बेड़ा पार करो। आपके कोई कमी तो है नहीं। इसलिए खोल दो खजाना। जनता आपके गुण गाएगी। लंबी उम्र की दुआ करेगी। बस, कह दिया कि आइंदा गलती नहीं करेंगे।

Sunday, 18 October, 2015

चुनाव मेँ पराजित अग्रवालों को भी सम्मानित किया चेतना मंच ने




श्रीगंगानगर। पहली बार आज किसी संस्था ने चुनाव मेँ पराजित हुए व्यक्तियों को भी सम्मानित किया। यह अनूठा काम किया  आग्रवाल राजनीतिक चेतना मंच ने। मंच ने आज शाम को महावीर दल मंदिर मेँ नगर परिषद और छात्र संघ चुनाव लड़ चुके अग्रवाल समाज के व्यक्तियों को सम्मानित किया। मुख्य अतिथि विधायक कामिनी जिंदल ने कहा कि अग्रवाल समाज का व्यक्ति देश की बागडोर संभालने मेँ सक्षम है। इसके लिए कोई मौका देगा नहीं। यह मौका हमें छीनना पड़ेगा। विधायक ने कहा कि अग्रवाल समाज ईमानदारी, कर्मठता के लिए जाना जाता है, लेकिन व्यक्ति राजनीतिक दल मेँ छोटा पद लेकर ही संतुष्ट हो बैठ जाता है। उसे ऐसा करने की बजाए और आगे जाने की कोशिश करनी चाहिए। कामिनी जिंदल ने कहा कि हमें इस सोच को बदलना होगा। विधायक ने सभी से एक जुट होकर आगे आने का आह्वान किया। होलसेल भंडार के अध्यक्ष शिवदयाल गुप्ता ने चेतना मंच के गठन को साहसी कदम बताते हुए इसकी सराहना की। उन्होने कहा कि मंच ने चुनाव मेँ पराजित व्यक्तियों को सम्मानित कर नई पहल की है। श्री गुप्ता ने मंच को पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। एडवोकेट नागर मल अग्रवाल ने कहा कि एक दूसरे को गले लगाने की इच्छा होगी तो एकता भी शुरू हो जाएगी। अग्रवाल सभा के राम गोपाल पांडुसरिया ने सुझाव दिया कि मंच उस स्थान पर अग्रवाल उम्मीदवार का समर्थन करे, जहां एक ही अग्रवाल चुनाव मैदान मेँ हो। नरेश मुन्ना ने कहा कि नई शुरुआत का परिणाम अच्छा आएगा। लेकिन चेतना के साथ साथ एकता की भी बात हो तो परिणाम और अच्छे आएंगे। श्री मुन्ना ने चेतना मंच के गठन को सराहनीय बताया। ओमी मित्तल ने कहा कि चेतना मंच को हर वार्ड, तहसील और जिले मेँ अपनी इकाइयों का गठन करना चाहिए। श्री मित्तल ने हर प्रकार के सहयोग का भरोसा दिलाया। महावीर गुप्ता ने कहा कि समाज को चिंतन करना चाहिए कि वह राजनीति मेँ पिछड़ा हुआ क्यों है। गिरधारी लाल गुप्ता ने कहा कि सभी पार्टी अग्रवाल को टिकट देंगी तो चेतना आएगी ही। भारत गर्ग के विचार थे कि किसी अग्रवाल को चुनाव लड़ने से रोकने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। उसे अपनी शक्ति दिखाने का मौका मिले। वरना उसे मलाल रहता है कि उसे हटा दिया गया। सुनीला गुप्ता ने कहा कि हारने वालों का सम्मान बड़ी बात है। सुनीला ने कहा, कि वे आइंदा भी चुनाव लड़ेंगी। मंच अध्यक्ष बंशीधर जिंदल ने कहा कि शुरुआत छोटी है, लेकिन धीरे धीरे इसका बड़ा रूप सामने आएगा। महासचिव गोविंद गोयल ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए मंच के गठन के उद्देश्य बताए। उन्होने इतने संगठन होने के बावजूद राजनीतिक चेतना मंच के गठन की वजह भी बताई। उनका कहना था कि आज ऐसे मंच की जरूरत है। मंच के पदाधिकारियों बंशीधर जिंदल, प्रभाती राम अग्रवाल, गुरदीप जिंदल, रवि सरावगी, अजय गर्ग, सुमित गर्ग कामिनी जिंदल ने मेहमानों का फूल माला पहना स्वागत किया। कामिनी जिंदल को गुलदस्ता भेंट किया। स्वाति गोयल और महक बंसल ने कामिनी जिंदल को फूल माला पहनाई। चुनाव लड़ने वालों को कामिनी जिंदल, नागर मल अग्रवाल, पीएनबी के चीफ मैनेजर डी के अग्रवाल, शिवदयाल गुप्ता ने सम्मान प्रतीक देकर अभिनंदन किया। 

Friday, 16 October, 2015

इंसान की औलाद है इंसान बनेगा.................



श्रीगंगानगर। बच्चों की पढ़ाई के लिए बिरादरी का विरोध सहा। समाज की  उपेक्षा बर्दाश्त की । हुक्का पानी तक बंद कर दिया गया । दूसरों के सहारे, दूसरों के  मोहल्ले मेँ पनाह मिली। आज इस व्यक्ति के परिवार मेँ 11 डॉक्टर हैं। कोई सफलता के शिखर पर पहुँच गया तो कोई सफलता की सीढ़ी चढ़ रहा है। जिनका जिक्र हो रहा है, उनका नाम है नज़ीर अहमद। जो मौलवी नज़ीर अहमद के नाम से जाने जाते रहे। इनका बीते बुधवार को हनुमानगढ़ के निकट स्थित अपने गांव रोडांवाली मेँ 84 साल की उम्र मेँ इंतकाल हो गया । अपनी ज़िंदगी के कई दशक संघर्ष मेँ गुजारे उन्होने । अंतिम समय तक शिक्षा के लिए घर घर जाते रहे। हिंदुस्तान के विभाजन के समय उनकी बिरादरी पाक चली गई। उनको भी उधर जाने की धुन सवार हो गई। क्योंकि उनको लगा कि  इधर मदरसे नहीं होंगे। किसी से पूछ-ताछ कर  पाक की राह पकड़ी। रोडांवाली से धोलीपाल। फिर गंगानगर से पाकिस्तान। बार्डर पर एक लड़का और मिल गया। नज़ीर अहमद ने अपना तोलिया उसको दे दिया। वो उसे कंधे पर रख आगे निकल गया। नज़ीर अहमद पकड़े गए। जिसने पकड़ा उसने नाम पता पूछ लिया। पतले दुबले नज़ीर अहमद जैसे तैसे अपना हाथ छुड़ाकर भाग लिए । बार्डर पर तैनात सुरक्षा कर्मी ने गोली चलाई। गोली उस लड़के के लगी, जिसके कंधे पर तोलिया था। घर नज़ीर अहमद के मरने की खबर आई। मरने के बाद जो रस्म होती है, परिवार ने वो कर ली गई। नज़ीर अहमद ने पाक मेँ मदरसे मेँ तालीम हासिल की। हिकमत करना सीखा। लगभग दस-बारह साल बाद किसी तरह गाँव वापिस आए। कौन पहचानता? खैर! बाद मेँ सब ठीक हो गया। शादी हो गई। नज़ीर अहमद इधर उधर गांवों अपनी बिरादरी के बच्चों को पढ़ाने लगे। इसके लिए घर घर जाते। पर, वे अपने मकसद से बहुत पीछे थे। क्योंकि गरीब उनको ये कहता, पढ़ाने से कोई लाभ नहीं। बच्चे मजूरी करेंगे तो घर चलेगा। अमीर ये बोलता, हमें क्या जरूरत है। कौनसा नौकरी करवानी है। मस्जिद मेँ नमाज पढ़ाना शुरू किया। पैसे मिलते नहीं थे। कोई कुछ दे देता तो पेट भर जाता। हिकमत जानते थे। हाथ साफ था। लोग आने लगे। मस्जिद मेँ पढ़ाने का काम जारी रखा। मौलवी हो गए। इसमें भी महारत हासिल हुई। लोग दुख तकलीफ दूर करवाने आने लगे। इस बीच उन्होने अपने बच्चे को स्कूल मेँ लगा दिया। बस, विरोध शुरू हो गया। मौलवी का बेटा स्कूल मेँ जाएगा। पक्का हिन्दू बनेगा। बच्चे को स्कूल से हटाने का दवाब पड़ा। उन्होने बच्चे को स्कूल से हटाने से साफ इंकार करते हुए कहा, आप भी अपने बच्चों को स्कूल मेँ दाखिल करवाओ। क्योंकि दीन-दुनिया, दोनों की पढ़ाई जरूरी है। किसी ने नहीं सुनी। उनको मस्जिद से हटा दिया गया। समाज ने लगभग बाहर कर दिया। उपेक्षित, लेकिन बच्चों की पढ़ाई पर अड़े नज़ीर अहमद को गाँव वालों ने संभाला। मदद की। रहने को ठिकाना दिया। धीरे धीरे उनके ज्ञान की ख्याति दूर दूर तक हो गई। हर उम्र और वर्ग के लोग उनके पास अपने दुख, दर्द, तकलीफ लेकर आने लगे। लोगों के काम होते गए। उन पर विश्वास बढ़ता गया। खुदा ने सब कुछ दिया। आठ संतान। नाम, सम्मान और धन भी। उनका बेटा हिन्दी-अङ्ग्रेज़ी ही नहीं, अरबी, फारसी भी जानता है। कुरान को केवल पढ़ता ही नहीं, उस पर अमल भी करता है। नज़ीर अहमद के लड़कों के पास खुदा के फजलों करम से आज इतना कुछ है कि वे चाहें तो अपने गाँव मेँ पिता नज़ीर अहमद की स्मृति  मेँ बढ़िया स्कूल बना और चला सकते हैं। जिसमें उनके पिता की रूह तो रहेगी ही इसके साथ साथ पिता के प्रयास भी सार्थक होंगे, जो उन्होने अपने अंतिम समय तक किए। ऐसे लोग कम ही होते हैं। होते भी हैं तो जिक्र नहीं होता। [ नज़ीर अहमद के बेटे इमदाद अहमद से हुई अनौपचारिक बातचीत के आधार पर] दो लाइन पढ़ो—
वो नींद मेँ मुस्कराए हैं, शरमाए हैं
यकीनन उनके ख्वाब मेँ हम आए हैं।

Wednesday, 14 October, 2015

ताड़का वध को देखने उमड़े लोग



श्रीगंगानगर श्री सनातन धर्म हनुमान राम नाटक समिति, श्रीगंगानगर के तत्वावधान में रामलीला मैदान में मंचित रामलीला मंगलवार की रात ताड़का वध का दृश्य मंचित किया गया। ताड़का वध देखने के लिए कई हजार दर्शक मौजूद थे। इतनी बड़ी संख्या मेँ लोगों को आधी रात तक मौजूद रहना रामलीला की सफलता को बताता है। श्याम रासरानिया ने ताड़का के सीन को बहुत ही शानदार ढंग से तैयार किया था। मंच पर श्याम ने ही मुकेश ही मदद से बहुत ही रोमांचकारी दृश्य दिखाया। जैसे ही ताड़का मंच पर आई, दर्शक खड़े हो गए। आधा घंटा से भी अधिक समय तक ताड़का अपना खौफ दिखाती रही। बड़ी संख्या मेँ दर्शक मंच के ऊपर आ गए। आरंभ मेँ मुख्य अतिथि कश्मीरीलाल जसूजा ने अपने सम्बोधन मेँ कलाकारों का उत्साहवर्धन किया। स्वागत अध्यक्ष जगीरचंद फरमा, विशिष्ट अतिथि गोविंद गोयल थे। अध्यक्ष ओम असीजा, सचिव राज जनवेजा, कोषाध्यक्ष सरदारीलाल बत्तरा, उपाध्यक्ष किशन लाल असीजा, संचालक चोरदास हर्ष, पदाधिकारीगण टीकमचंद अग्रवाल, भागीरथ गोयल, सतीश पुंछी, इन्दुभूषण चावला, राजेश असीजा, विनोद पुन्यानी, श्याम रासरानियां, पूर्णचंद मौर्य, अमन मौर्य व सदस्यगण कलाकारों व दर्शकों का उत्साहवर्धन कर रहे हैं। संचालक चोरदास हर्ष हैं।