Wednesday, 4 November, 2015

गंगानगर को ना दो, राधेश्याम गंगानगर को दे दो


श्रीगंगानगर। मैडम वसुंधरा राजे सिंधिया, जो प्रदेश की मुख्यमंत्री है, को इस बात का बहुत मलाल है कि श्रीगंगानगर के लोगों ने बीजेपी को बुरी तरह से हरा दिया। दो साल हो गए। मैडम ने हार को दिल से लगा रखा है । दर्द अभी तक होता है। ये दर्द तब और बढ़ जाता है जब कोई उनके सामने गंगानगर की बात करता है। गंगानगर के लिए कुछ मांगता है। समस्या के समाधान की बात करता है। इतना दर्द तो मुझे मेरी प्रेयसी के नाम से नहीं होता। मुझे क्या किसी को नहीं होता होगा। दर्द की भी सीमा होती है। किन्तु भाजपाइयों की माने तो मैडम के इस दर्द की कोई लिमिट नहीं। अब चूंकि गंगानगर के नाम से ही जब सीने मेँ दर्द उठे तो फिर उसका नाम लिया ही क्यों जाए। नजरंदाज करो! दफा करो! होने दो जो होता है! लगा दो किसी को भी अफसर। भेज दो गंगानगर। सड़ने दो, गलने दो गंगानगर को। इसे कहते हैं सॉलिड राज हठ। दमदार त्रिया हठ। हठ तो एक ही भारी होता है। इधर तो दो दो हैं। वो भी खानदानी। कोई बोले तो बोले कैसे। हिम्मत ही नहीं। तो बात हो रही थी गंगानगर मेँ हुई हार से घर कर गए दर्द की। चूंकि गंगानगर ने मैडम की झोली मेँ कुछ नहीं डाला, इसलिए मैडम भी क्यों दें! गंगानगर को मत दो! भूल जाओ गंगानगर को! सबक सिखाओ गंगानगर को! बदला लो गंगानगर के लोगों से! जो बुरा कर सकते हो करो! ताकि गंगानगर के लोग फिर ऐसी गुस्ताखी आपके दरबार मेँ ना करें। आपकी शान मेँ ना हो। मगर मैडम जी, राधेश्याम गंगानगर तो आपके मुंह बोले भाई हैं। वे तो कई साल पहले अपनी माँ जैसी कांग्रेस को छोड़ आपकी शरण मेँ आ गए थे। उनकी क़ुरबानी का तो ख्याल करो। उनके त्याग का सम्मान करो। ये दोनों नहीं तो उनके इस उम्र मेँ सेवा के जज्बे की तरफ ही देख लो। चलो माना, गंगानगर ने आपको नहीं अपनाया। उसकी परवाह आप क्यों करो! राधेश्याम गंगानगर ने तो आपको अपनाया है। उसकी फिक्र तो करो। अब समय ही कितना बचा है। आपके खजाने मेँ क्या कमी है! दो दो बार हारे दिगंबर सिंह कि भी ताज पहना ही दिया आपने। किस्मत संवार दी आपने उनकी। हमारे राधेश्याम गंगानगर तो एक बार ही हारें हैं। फिर इनसे बेरुखी क्यों? जब आपको इनकी हार का इतना दर्द है तो फिर इनको कुछ देकर अपना दर्द दूर करो। कितना आसान उपाए है। इनका काम हो जाएगा, आपका दर्द दूर हो जाएगा। आपको दुआ मिलेगी। ठीक है, इतने विधायकों के रहते आपको और दुआ की जरूरत नहीं। लेकिन लेने मेँ जाता क्या है! ये कौनसा मौसमी फल है, जो खराब हो जाएगा। अब जीतने वाले तो ऐसे कहेंगे ही कि हाय हाय, हारे हुए को दे दिया, हमें नहीं। कहने दो। आपके क्या फर्क पड़ता है। आपने पहले कहाँ किसकी सुनी है। तो मैडम जी, गंगानगर को कुछ मत दो, राधेश्याम गंगानगर को दे दो। उसी  मेँ गंगानगर खुश हो जाएगा। कल हो ना हो। आज ही कर दो ये काम । बेशक इस शर्त के साथ कि बनने के बाद गंगानगर को कुछ नहीं देंगे राधेश्याम। सच्ची बताऊँ मैडम जी, मुझसे ना तो आपका दर्द देखा जा रहा है और  ना राधेश्याम गंगानगर का। क्योंकि जिसे दर्द हो वही दर्द को महसूस कर सकता है। मैंने ये दर्द महसूस किया, तभी तो आपके दरबार मेँ अर्जी लगा रहा हूँ। बस, आप तो गंगानगर को भूल जाओ, अपने मुंह बोले भाई राधेश्याम गंगानगर को याद रखो । दो लाइन पढ़ो—

सबको घाव दिखाऊँ क्यों सबको दर्द बताऊँ क्यो, किसने कितने पत्थर मारे घर घर गीत ये गाऊँ क्यों। 

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